अनुग्रहोऽयं भवत: कृतो हि नो
दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापह: ।
यद् दन्दशूकत्वममुष्य देहिन:
क्रोधोऽपि तेऽनुग्रह एव सम्मत: ॥ ३४ ॥
अनुवाद
आपने जो कुछ भी यहाँ किया है वह वास्तव में हमारे लिए दया का काम है। क्योंकि आप दुष्टों को जो दंड देते हैं वह निश्चित रूप से उनके पापों को दूर कर देता है। और क्योंकि यह बद्धजीव हमारा पति बहुत पापी है और उसने साँप का शरीर धारण कर लिया है, इसलिए उसके प्रति आपका यह क्रोध उसकी ओर आपकी दया ही है।
What You have done here is actually Your mercy upon us, for the punishment You inflict on the wicked certainly removes their contamination. Since this conditioned soul, our husband, is so sinful that he has taken the body of a serpent, Your anger upon him should be regarded as Your mercy upon him.
तात्पर्य
इस संदर्भ में श्रील माधवाचार्य बताते हैं कि जब इस संसार में एक पवित्र व्यक्ति को कष्ट होता है, तो उसे अहसास होता है कि "परम प्रभु जो मुझे दंड दे रहे हैं, वह वास्तव में उनकी अकारण कृपा है।" हालाँकि, ईर्ष्यालु व्यक्ति, अपने शुद्धिकरण के लिए प्रभु द्वारा दंडित किए जाने के बाद भी, उनसे ईर्ष्या करना और नाराज़ होना जारी रखते हैं, और यह रवैया परम सत्य को न समझ पाने का निरंतर कारण है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥