श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  10.16.24 
तत्प्रथ्यमानवपुषा व्यथितात्मभोग-
स्त्यक्त्वोन्नमय्य कुपित: स्वफणान् भुजङ्ग: ।
तस्थौ श्वसञ्छ्वसनरन्ध्रविषाम्बरीष-
स्तब्धेक्षणोल्मुकमुखो हरिमीक्षमाण: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के शरीर का विस्तार बढ़ने से कालिय की कुंडली को कष्ट पहुँचाने लगा, इसलिए उसने भगवान को छोड़ दिया। तब क्रोध से भरा हुआ वह सर्प अपने फनों को ऊँचा उठाकर स्थिर खड़ा हो गया और जोर-जोर से फुफकारने लगा। उसके नथुने विष पकाने के बर्तनों की तरह दिखाई दे रहे थे और उसके चेहरे में घूरती आँखें आग के शोलों की तरह जल रही थीं। इस प्रकार सर्प ने भगवान की ओर देखा।
 
भगवान के शरीर का विस्तार बढ़ने से कालिय की कुंडली को कष्ट पहुँचाने लगा, इसलिए उसने भगवान को छोड़ दिया। तब क्रोध से भरा हुआ वह सर्प अपने फनों को ऊँचा उठाकर स्थिर खड़ा हो गया और जोर-जोर से फुफकारने लगा। उसके नथुने विष पकाने के बर्तनों की तरह दिखाई दे रहे थे और उसके चेहरे में घूरती आँखें आग के शोलों की तरह जल रही थीं। इस प्रकार सर्प ने भगवान की ओर देखा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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