श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 15: धेनुकासुर का वध  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  10.15.2 
तन्माधवो वेणुमुदीरयन् वृतो
गोपैर्गृणद्भ‍ि: स्वयशो बलान्वित: ।
पशून् पुरस्कृत्य पशव्यमाविशद्
विहर्तुकाम: कुसुमाकरं वनम् ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
अपनी लीलाओं का आनंद लेने की इच्छा से श्री माधव अपनी वंशी बजाते हुए अपने गुणगान करने वाले ग्वालबालों से घिरे हुए और बलराम के साथ चलते हुए गायों को अपने आगे कर वृंदावन के वन में पहुंचे जो फूलों से लदा था और पशुओं के पौष्टिक चारे से भरा हुआ था।
 
Thus desirous of enjoying His pastimes, playing His flute, surrounded by cowherd boys singing His praises, and accompanied by Baladeva, Madhava led the cows before Him and entered the forest of Vrindavana, which was awash with flowers and abounded with wholesome fodder for the animals.
तात्पर्य
श्रील सनातन गोस्वामी ने माधव शब्द के विभिन्न अर्थों को इस प्रकार समझाया है। माधव सामान्य रूप से कृष्ण को "भगवान, जो कि भाग्य की देवी लक्ष्मी के पति हैं" के रूप में इंगित करता है। यह नाम यह भी बताता है कि भगवान कृष्ण मधु के वंश में अवतरित हुए थे। चूंकि वसंत ऋतु को भी माधव के रूप में जाना जाता है, इसलिए यह समझा जाता है कि जैसे ही भगवान कृष्ण वृंदावन के जंगल में प्रवेश करते हैं, यह स्वचालित रूप से वसंत के सभी वैभव का प्रदर्शन करता है, जो फूलों, हवाओं और एक आकाशीय वातावरण से भरा होता है। भगवान कृष्ण को माधव इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि वह मधु में अपने समय का आनंद लेते हैं, जो कि संयुग्मित प्रेम का आनंद है।

श्री वृंदावन के जंगल में प्रवेश करते हुए भगवान कृष्ण अपनी बांसुरी की ध्वनि से पूरे शहरवासियों को असीम आनंद प्रदान करते है, जो उनके गृहनगर, व्रज-धाम है। ये सरल समय जंगल में प्रवेश करने का, बांसुरी बजाने और इसी तरह से वृंदावन की आध्यात्मिक भूमि में दैनिक रूप से किया जाता था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)