श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 15: धेनुकासुर का वध  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  10.15.16 
क्‍वचित् पल्लवतल्पेषु नियुद्धश्रमकर्शित: ।
वृक्षमूलाश्रय: शेते गोपोत्सङ्गोपबर्हण: ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी भगवान कृष्ण युद्ध करते-करते थक जाते और किसी वृक्ष की जड़ के पास लेट जाते जहाँ मुलायम टहनियों और कोंपलों से बना हुआ बिस्तर होता था और किसी ग्वाले मित्र की गोद उनका तकिया बन जाती।
 
Sometimes, Lord Krishna would get tired of fighting and would lie down on a bed made of soft twigs and buds near the root of a tree, using the lap of one of his cowherd friends as a pillow.
तात्पर्य
पल्लव-तल्पेषु शब्द का यह भाव है कि भगवान कृष्ण ने अपने आप को कई रूपों में विस्तारित कर लिया और उत्साही ग्वालों द्वारा शीघ्र ही बनाए गए, पत्तों और फूलों के पलंगों में लेट गए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)