कभी-कभी वृन्दावन में भौंरे आनंद में इतने तल्लीन हो जाते थे कि वे अपनी आँखें बंद करके गाने लगते थे। श्री कृष्ण अपने ग्वालमित्रों तथा बलदेव के साथ जंगल में विचरण करते हुए अपने राग में उनके गुनगुनाने की नकल उतारते थे और उनके मित्र उनकी लीलाओं का गायन करते थे। भगवान कृष्ण कभी-कभी कोयल की बोली की नकल उतारते तो कभी हंसों के कलरव की नकल उतारते। कभी वे मोर के नृत्य की नकल उतारते जिस पर उनके ग्वालमित्र खिलखिला पड़ते। कभी-कभी वे बादलों जैसे गंभीर गर्जन के स्वर में झुंड से दूर गये हुए पशुओं का नाम लेकर बड़े प्यार से पुकारते जिससे गायें तथा ग्वालबाल मुग्ध हो जाते।
कभी-कभी वृन्दावन में भौंरे आनंद में इतने तल्लीन हो जाते थे कि वे अपनी आँखें बंद करके गाने लगते थे। श्री कृष्ण अपने ग्वालमित्रों तथा बलदेव के साथ जंगल में विचरण करते हुए अपने राग में उनके गुनगुनाने की नकल उतारते थे और उनके मित्र उनकी लीलाओं का गायन करते थे। भगवान कृष्ण कभी-कभी कोयल की बोली की नकल उतारते तो कभी हंसों के कलरव की नकल उतारते। कभी वे मोर के नृत्य की नकल उतारते जिस पर उनके ग्वालमित्र खिलखिला पड़ते। कभी-कभी वे बादलों जैसे गंभीर गर्जन के स्वर में झुंड से दूर गये हुए पशुओं का नाम लेकर बड़े प्यार से पुकारते जिससे गायें तथा ग्वालबाल मुग्ध हो जाते।