श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  10.14.9 
पश्येश मेऽनार्यमनन्त आद्ये
परात्मनि त्वय्यपि मायिमायिनि ।
मायां वितत्येक्षितुमात्मवैभवं
ह्यहं कियानैच्छमिवार्चिरग्नौ ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, कृपया मेरी अशिष्टता नोट करें! आपकी शक्ति का मूल्यांकन करने के लिए मैंने अपनी भ्रमपूर्ण क्षमता का उपयोग करके आपको ढंकने का प्रयास किया, जबकि आप असीम और मूल अतिआत्मा हैं, जो भ्रम के स्वामी को भी चकित कर देते हैं। तुम्हारे सामने मैं क्या हूँ? मैं एक विशाल आग की उपस्थिति में एक छोटी सी चिंगारी की तरह हूँ।
 
O Lord, look at my impudence! To test Your power, I tried to cover You with my illusory power, whereas You are the infinite and original Supreme Being, who bewilders even the masters of illusion. What am I before You? I am like a small spark in the presence of a huge fire.
तात्पर्य
एक महान अग्नि से कईं चिंगारियाँ निकलती है, जो उसकी तुलना में नगण्य होती है। वास्तव में, यदि कोई भी छोटी सी चिंगारी मूल अग्नि को जलाने की कोशिश करे, तो प्रयास केवल हास्यास्पद ही होगा। इसी तरह, पूरे ब्रह्मांड के निर्माता भगवान ब्रह्मा भी ईश्वर की शक्ति की एक तुच्छ चिंगारी है, और इसलिए भगवान को भ्रमित करने का ब्रह्मा का प्रयास निश्चित रूप से हास्यास्पद था।

यहां ब्रह्मा भगवान कृष्ण को ईश कहते हैं, जो इंगित करता है कि कृष्ण न केवल सभी के सर्वोच्च स्वामी हैं बल्कि विशेष रूप से ब्रह्मा के भी स्वामी हैं, जो भगवान के मार्गदर्शन में सीधे ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं और जो वास्तव में, सीधे भगवान के शरीर से ही पैदा हुए हैं।

भगवान कृष्ण को बहकाने के अपने अशिष्ट प्रयास से ब्रह्मा को शर्म आ गई, और इसलिए वह भगवान के निर्णय के अनुसार दंडित किए जाने या क्षमा किए जाने के लिए पूरी तरह से तैयार थे। यदि भगवान कृष्ण अपने भक्तों को अनुचित कार्य करने पर दयापूर्वक दंडित नहीं करते हैं, तो उनकी मूर्खता केवल बढ़ेगी और धीरे-धीरे उनकी भक्ति भावनाओं को पूरी तरह से अभिभूत कर देगी। इसलिए भगवान कृष्‍ण अपने भक्‍तों को दयापूर्वक अनुशासित करते हैं और उन्‍हें वापस घर, भगवान के पास जाने के लिए प्रगतिशील पथ पर बनाए रखते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)