श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  10.14.61 
एवं विहारै: कौमारै: कौमारं जहतुर्व्रजे ।
निलायनै: सेतुबन्धैर्मर्कटोत्‍प्लवनादिभि: ॥ ६१ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार व्रज भूमि में बालकों ने अपना बचपन आँखमिचौनी के खेल में, खेलते-खेलते पुल बनाते हुए, बंदरों की नकल उतारते हुए और इसी तरह के दूसरे खेलों में उलझे हुए बिताया।
 
In this manner, children spent their childhood in Vraj Bhoomi, playing hide and seek, building bridges while playing, jumping around like monkeys, and engaging in other similar games.
तात्पर्य
श्रील सनातन गोस्वामी के अनुसार, शब्द 'नीलायनै:' लुका-छिपी या पुलिस और चोर जैसे खेलों का उल्लेख करता है। कभी-कभी लड़के भगवान रामचंद्र की सेना में बंदरों की तरह इधर-उधर कूदते और फिर झीलों या तालाबों में खेल के पुलों का निर्माण करके श्रीलंका के लिए पुल के निर्माण का अभिनय करते। कभी-कभी लड़के समुद्र मंथन के मनोरंजन का अनुकरण करते और कभी-कभी वे गेंदों से कैच खेलते। हम आध्यात्मिक दुनिया में पूर्ण आनंद पा सकते हैं, इस साधारण शर्त के साथ कि सब कुछ भगवद्भक्ति, कृष्ण चेतना के शुद्ध प्रेम में किया जाए।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत चौदहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)