तुम कृष्ण को सारे जीवों की आदि आत्मा ही समझो। उन्होंने अपने निस्वार्थ उपकार भाव से, पूरे जगत के लाभ के लिए, सर्वसाधारण मानव की तरह ही अपने आप को परिभाषित किया है । यह सब उन्होंने अपनी अंदरूनी शक्ति के बल पर किया है।
You should know Krishna as the primal soul of all beings. Out of His causeless grace, for the benefit of the entire world, He has appeared as an ordinary human being. He has done so on the strength of His inner power.
तात्पर्य
चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला के अध्याय बीस के 162वें सूत्र पर श्रील प्रभुपाद ने इस पद पर कुछ इस प्रकार टिप्पणी की है: "परीक्षित महाराज ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा कि कृष्ण वृंदावन के निवासियों के इतने प्रिय क्यों हैं, जो उन्हें अपने ही बच्चों या जीवन से भी अधिक प्यार करते हैं। उस समय, शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया कि हर किसी की आत्मा या प्राण बहुत ही प्यारे होते हैं, खास तौर पर उन सभी प्राणियों के लिए जिन्होंने भौतिक शरीर को ग्रहण किया है। हालाँकि, वह आत्मा, वह प्राण, कृष्ण का अभिन्न अंग है। इसी कारण से, कृष्ण हर प्राणी को बहुत प्रिय होते हैं। हर किसी का शरीर उसे बहुत प्रिय होता है और वह हर तरह से शरीर की रक्षा करना चाहता है क्योंकि शरीर के अंदर आत्मा निवास करती है। आत्मा और शरीर के बीच घनिष्ठ संबंध के कारण, शरीर हर किसी के लिए महत्वपूर्ण और प्रिय होता है। उसी तरह से, आत्मा, जो कि परमेश्वर कृष्ण का अभिन्न अंग है, वह हर प्राणी के लिए बहुत ही प्रिय है। दुर्भाग्य से, आत्मा अपनी संवैधानिक स्थिति को भूल जाती है और सोचती है कि वह सिर्फ शरीर है (देहात्म-बुद्धि)। इसलिए आत्मा भौतिक प्रकृति के नियमों और विनियमों के अधीन हो जाती है। जब कोई प्राणी, अपनी बुद्धि से, कृष्ण के प्रति अपने आकर्षण को फिर से जगाता है, तो वह समझ सकता है कि वह शरीर नहीं है बल्कि कृष्ण का अभिन्न अंग है। इस प्रकार ज्ञान से परिपूर्ण होने के बाद, वह अब शरीर से जुड़ाव में नहीं रहता है और शरीर से संबंधित हर चीज़ से मुक्त हो जाता है (जनस्य मो'अंह अहम् ममेति)। भौतिक अस्तित्व, जिसमें कोई सोचता है, 'मैं शरीर हूँ, और यह मेरा है,' वह भी भ्रामक है। किसी को अपना लगाव कृष्ण की ओर मोड़ना चाहिए। श्रीमद्-भागवतम (1.2.7) में कहा गया है: वासुदेवे भगवति भक्ति-योगः प्रयोजितः जनयत्य आशु वैराग्यं ज्ञानं च यद अहैतुकाम् 'ईश्वर श्री कृष्ण के प्रति भक्ति-योग करने से, कोई भी तुरंत बिना किसी कारण से प्राप्त होने वाला ज्ञान और दुनिया से वैराग्य प्राप्त कर लेता है।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥