हे मेरे प्रिय श्री कृष्ण, आप कमल तुल्य वृष्णि कुल को सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं और पृथ्वी, देवता, ब्राह्मण तथा गौओं से युक्त महासागर को बढ़ाते हैं। आप अधर्म के घने अंधकार को दूर करते हैं और इस धरती पर प्रकट हुए राक्षसों का विरोध करते हैं। हे भगवान, जब तक यह ब्रह्मांड रहेगा और जब तक सूर्य चमकता रहेगा, मैं आपको नमन करता रहूँगा।
O Krishna, You are the lotus-like giver of happiness to the Vrishni clan and the one who increases the earth, the demigods, the brahmanas and the ocean that is filled with cows. You dispel the deep darkness of irreligion and oppose the demons who have appeared on this earth. O Lord, as long as this universe exists and as long as the sun shines I will offer my respectful obeisances unto You.
तात्पर्य
श्रील सनातन गोस्वामी के अनुसार, भगवान ब्रह्मा यहाँ नाम-संकीर्तन के आनंद में लीन हैं, जो भगवान कृष्ण के विभिन्न पवित्र नामों का गुणगान कर रहे हैं जो उनके विविध लीलाओं का संकेत देते हैं। भगवान कृष्ण ने पृथ्वी की राक्षसी आबादी को कुशलतापूर्वक दबा दिया, जो कंसा, जरासंध और शिशुपाल जैसे राक्षसी राजनेताओं के आगमन के साथ असहनीय हो गई। इसी तरह, आधुनिक समाज में ऐसे कई तथाकथित ईश्वर-भयभीत लोग हैं जो वास्तव में राक्षसी अस्तित्व की ओर आकर्षित हैं। ऐसे व्यक्ति सूर्यास्त के साथ उत्साहित हो जाते हैं और रेस्तरां, नाइट क्लब, डिस्को, होटल आदि में जीवन का आनंद लेने के लिए अंधेरे में चले जाते हैं, जो सभी केवल अवैध सेक्स, नशा, जुआ और मांस-ाहार के लिए होते हैं। फिर ऐसे लोग हैं जो खुले तौर पर ईश्वर और उनके कानूनों को धता बताते हैं, खुद को नास्तिक और दानव घोषित करते हैं। प्रभु के गुप्त और प्रकट दोनों दुश्मन पृथ्वी के लिए एक अपवित्र बोझ हैं, और भगवान कृष्ण इस बोझ को कुशलतापूर्वक हटाने के लिए उतरते हैं। यहाँ भगवान ब्रह्मा अप्रत्यक्ष रूप से बताते हैं कि भगवान कृष्ण को ब्रह्मा के अपने सूक्ष्म नास्तिकता को दूर करना चाहिए, जिसके कारण उसने भगवान कृष्ण पर मायावी शक्ति का प्रयोग करने की कोशिश की। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, भगवान ब्रह्मा अपनी शर्म में खुद को सत्यलोक के ब्रह्मराक्षस की तरह महसूस करते थे जो भगवान कृष्ण और उनके घनिष्ठ मित्रों और बछड़ों को परेशान करने के लिए पृथ्वी पर आए थे। ब्रह्मा विलाप कर रहे हैं कि यद्यपि भगवान कृष्ण सर्वोच्च हैं, सभी स्वामियों के स्वामी, क्योंकि वे ब्रह्मा के सामने इतने सरल और निर्दोष रूप में प्रकट हुए थे - एक छड़ी, एक शंख, आभूषण, लाल मिट्टी, एक मोर पंख और इतने पर सजाया गया था, और अपने चरवाहे प्रेमी के साथ खेल रहे थे - ब्रह्मा ने उन्हें चुनौती देने की हिम्मत की। ब्रह्मा की प्रार्थनाओं के बारे में, जिनमें से यह श्लोक निष्कर्ष है, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं, "ब्रह्मा की ये प्रार्थनाएँ, जो सभी संदेहों को दूर करती हैं और भक्ति सेवा के सभी निश्चित निष्कर्षों को प्रसारित करती हैं, मेरी चेतना की नींव की विशेषज्ञ शिल्प कौशल बन सकती हैं।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥