कोई यह तर्क दे सकता है कि योग का अभ्यास करने या निष्पक्ष ज्ञान प्राप्त करके, कोई प्रतिष्ठा, धन, रहस्यमय शक्तियाँ या यहाँ तक कि निष्पक्ष मुक्ति भी प्राप्त कर सकता है| पर ये तथाकथित लाभ वास्तव में बेकार होते हैं, क्योंकि ये सजीव को परम भगवान के प्रति प्रेमपूर्ण सेवा के अपने संवैधानिक पद पर स्थापित नहीं करते हैं| इसलिए ऐसे परिणाम, सजीव के आवश्यक स्वभाव के लिए अनावश्यक होकर, अस्थायी होते हैं| जैसे कि नृसिम्ह पुराण में कहा गया है, पतृषु पुष्पैषु फलेषु तोयेष्व अक्रीता-लभ्येषु वदइवा सत्सु, भक्तया सु-लभ्ये पुरुषे पुराणे मुक्त्यै किमर्थं क्रियते प्रयत्नः:? "चूँकि परमेश्वर का प्रारंभिक व्यक्तित्व उन्हें पत्ते, फूल, फल और पानी जैसी चीज़ें अर्पित करके आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, जो कि बिना किसी कठिनाई के पाए जाते हैं, फिर किसी को अलग से मुक्ति के लिए प्रयास करने की आवश्यकता क्यों है?"
हालाँकि भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति सेवा की प्रक्रिया बहुत सरल है, लेकिन सशर्त और जिद्दी आत्माओं के लिए सर्वोच्च व्यक्ति के भगवान के सामने खुद को पूरी तरह से विनम्र करना और उनकी प्रेमपूर्ण सेवा में दिन के चौबीसों घंटे खुद को समाहित करना बेहद मुश्किल है| प्रेमपूर्ण सेवा का भाव ईश्वर को चुनौती देने और आनंद लेने के लिए दृढ़, सशर्त आत्माओं के लिए अभिशाप है| जब ऐसी जिद्दी, सशर्त आत्माएँ दार्शनिक अटकलों, तपस्या और योग के माध्यम से ईश्वर के समर्पण को दरकिनार करने का प्रयास करती हैं, तो भगवान के शक्तिशाली कानूनों द्वारा उन्हें भौतिक मंच पर वापस लौटा दिया जाता है और हिंसक रूप से भौतिक दुनिया नामक तुच्छता के भारी समुद्र में विलीन कर दिया जाता है|
