श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  10.14.4 
श्रेय:सृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो
क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये ।
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते
नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम् ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
प्रभु, आत्म-साक्षात्कार का सबसे सरल और उत्तम मार्ग आपकी ही भक्ति है। अगर कोई व्यक्ति इस मार्ग को छोड़कर ज्ञान के क्षेत्र में जाकर मानसिक अनुशीलन करने में लग जाता है, तो वह कष्ट उठाएगा और उसे वांछित फल भी नहीं मिलेगा। जैसे कि खाली भूसे को कूटने से अनाज नहीं निकलता, उसी तरह केवल विचार करने से आत्म-साक्षात्कार नहीं हो सकता। इसका परिणाम केवल कष्ट होगा।
 
O Lord, the best way to self-realization is devotion to you. If someone abandons this path and starts pursuing knowledge, he will have to bear pain and will not get the desired result. Just as you cannot get grain (wheat) by beating the empty husk, similarly, the one who only thinks cannot get self-realization. He only gets pain.
तात्पर्य
सर्वोच्च व्यक्ति के लिए प्रेमपूर्ण सेवा प्रत्येक जीवित संस्था का स्वाभाविक और शाश्वत कार्य है| यदि कोई व्यक्ति अपने संवैधानिक कार्य को त्याग देता है और इसके बदले कष्टमय ढंग से निष्पक्ष, सैद्धांतिक ज्ञान के माध्यम से तथाकथित ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहता है, तो उसका परिणाम केवल परेशानी और झंझट होता है जो कि एक कृत्रिम प्रक्रिया का अनुसरण करने से आता है| एक मूर्ख खाली भूसी को पीट सकता है, यह जाने बिना कि अनाज पहले ही निकाल दिया गया है| इसी तरह मूर्ख वह व्यक्ति है जो बार-बार भगवान के परम व्यक्तित्व के समक्ष समर्पण किए बिना ही ज्ञान की खोज में अपने मन को लगाता है, क्योंकि परम व्यक्तित्व भगवान ही ज्ञान का मूल सार हैं और उन्हें ही ज्ञान प्राप्ति का लक्ष्य माना जाता है, जैसे अनाज पूरे कृषि प्रयास का मूल और लक्ष्य है| वैदिक ज्ञान या, वास्तव में, भगवान के व्यक्तित्व के बिना भौतिक विज्ञान बिल्कुल गेहूं के खाली और बेकार भूसी की तरह है|

कोई यह तर्क दे सकता है कि योग का अभ्यास करने या निष्पक्ष ज्ञान प्राप्त करके, कोई प्रतिष्ठा, धन, रहस्यमय शक्तियाँ या यहाँ तक कि निष्पक्ष मुक्ति भी प्राप्त कर सकता है| पर ये तथाकथित लाभ वास्तव में बेकार होते हैं, क्योंकि ये सजीव को परम भगवान के प्रति प्रेमपूर्ण सेवा के अपने संवैधानिक पद पर स्थापित नहीं करते हैं| इसलिए ऐसे परिणाम, सजीव के आवश्यक स्वभाव के लिए अनावश्यक होकर, अस्थायी होते हैं| जैसे कि नृसिम्ह पुराण में कहा गया है, पतृषु पुष्पैषु फलेषु तोयेष्व अक्रीता-लभ्येषु वदइवा सत्सु, भक्तया सु-लभ्ये पुरुषे पुराणे मुक्त्यै किमर्थं क्रियते प्रयत्नः:? "चूँकि परमेश्वर का प्रारंभिक व्यक्तित्व उन्हें पत्ते, फूल, फल और पानी जैसी चीज़ें अर्पित करके आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, जो कि बिना किसी कठिनाई के पाए जाते हैं, फिर किसी को अलग से मुक्ति के लिए प्रयास करने की आवश्यकता क्यों है?"

हालाँकि भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति सेवा की प्रक्रिया बहुत सरल है, लेकिन सशर्त और जिद्दी आत्माओं के लिए सर्वोच्च व्यक्ति के भगवान के सामने खुद को पूरी तरह से विनम्र करना और उनकी प्रेमपूर्ण सेवा में दिन के चौबीसों घंटे खुद को समाहित करना बेहद मुश्किल है| प्रेमपूर्ण सेवा का भाव ईश्वर को चुनौती देने और आनंद लेने के लिए दृढ़, सशर्त आत्माओं के लिए अभिशाप है| जब ऐसी जिद्दी, सशर्त आत्माएँ दार्शनिक अटकलों, तपस्या और योग के माध्यम से ईश्वर के समर्पण को दरकिनार करने का प्रयास करती हैं, तो भगवान के शक्तिशाली कानूनों द्वारा उन्हें भौतिक मंच पर वापस लौटा दिया जाता है और हिंसक रूप से भौतिक दुनिया नामक तुच्छता के भारी समुद्र में विलीन कर दिया जाता है|

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)