श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  10.14.32 
अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम् ।
यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
नंद महाराज, सारे ग्वाले तथा व्रजभूमि के बाकी नागरिक कितने खुशकिस्मत हैं! उनका सौभाग्य असीमित है, क्योंकि दिव्य सुखों के स्रोत परम सत्य अर्थात् सनातन परब्रह्म उनके मित्र बन गए हैं।
 
How fortunate are Nanda Maharaja, all the cowherds and the other residents of Vrajabhumi! Their good fortune knows no bounds because the Absolute Truth, the eternal Supreme Brahman, the source of divine bliss, has become their friend.
तात्पर्य
इस अनुवाद को श्रील प्रभुपाद के चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला, अध्याय छह, पद 149 से उद्धृत किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)