हे अनन्त प्रभु, संतजन अपने शरीर के भीतर सब कुछ त्याग कर तुम्हें ढूँढ निकालते हैं। वास्तव में, विचार करनेवाले व्यक्ति अपने समक्ष स्थित रस्सी के असली स्वरूप को कैसे समझ सकते हैं जब तक वे इस भ्रम का निराकरण नहीं कर लेते कि यह साँप है?
O Infinite Lord, the saints seek You within their own bodies, rejecting everything that is different from You. Indeed, how can the discriminators know the true nature of the rope lying before them unless they get rid of the illusion that it is a snake?
तात्पर्य
यह तर्क दिया जा सकता है कि व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार की साधना करे और साथ ही साथ भौतिक शरीर के लिए इंद्रिय तृप्ति का अनुसरण भी करे। इस मान्यता को यहाँ एक रस्सी को साँप समझने के उदाहरण से खारिज कर दिया गया है। जो व्यक्ति रस्सी को साँप समझ लेता है वह भयभीत हो जाता है और तथाकथित साँप के बारे में सोचता है। लेकिन यह पता चलने पर कि तथाकथित साँप वास्तव में एक रस्सी है, वह एक अलग भावना - राहत का अनुभव करता है - और फिर रस्सी की उपेक्षा कर सकता है। इसी तरह, क्योंकि हम भौतिक शरीर को आत्मा समझ लेते हैं, हम शरीर के संबंध में कई भावनाओं का अनुभव कर रहे हैं। हालाँकि, यह पता चलने पर कि शरीर केवल भौतिक रसायनों का एक थैला है, हम ध्यान से नोट करते हैं कि यह भ्रम कैसे बना और फिर शरीर में रुचि खो देते हैं। यह पता चलने पर कि हम वास्तव में शरीर के भीतर एक शाश्वत आत्मा हैं, हम स्वाभाविक रूप से उस वास्तविक आत्मा पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। जो लोग संत और बुद्धिमान हैं वे हमेशा कृष्ण चेतना, आध्यात्मिक ज्ञान की साधना करते हैं, जो शरीर को आत्मा के रूप में पहचानने की मूर्खतापूर्ण गलतफहमी से परे है। ऐसे कृष्ण भक्त परम भगवान का एहसास करते हैं, जो भौतिक शरीर में परमात्मा के रूप में वास करते हैं - प्रत्येक जीवित प्राणी के साक्षी और मार्गदर्शक। परमात्मा और व्यक्तिगत आत्मा का साक्षात्कार इतना सुखद और संतुष्टिदायक होता है कि एक आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए अप्रासंगिक हर चीज को स्वतः ही त्याग देता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥