श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  10.14.22 
तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं
स्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदु:खदु:खम् ।
त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते
मायात उद्यदपि यत् सदिवावभाति ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए यह पूरा ब्रह्मांड, जो एक स्वप्न के समान स्वभाव से असत्य है, फिर भी वास्तविक प्रतीत होता है, और इस प्रकार यह मनुष्य की चेतना को ढक लेता है और उसे बार-बार दुखों से घेरता है। यह ब्रह्मांड सत्य इसलिए प्रतीत होता है क्योंकि यह आपकी माया की शक्ति द्वारा प्रकट होता है, जिसके अनंत दिव्य रूप शाश्वत सुख और ज्ञान से भरे हुए हैं।
 
Thus this entire universe, which is like a dream, is unreal by nature, yet appears to be real (sat), and thus it bewilders man's consciousness and causes repeated suffering. This universe appears to be real because it is manifested by the power of Maya, emanating from You, whose innumerable divine forms are full of eternal happiness and wisdom.
तात्पर्य
भौतिक जगत, भोग-विलास का साधन या शाश्वत निवास के लिए, निश्चित रूप से भ्रम है, मात्र एक स्वप्न मात्र है। हम उस उदाहरण की तरह दे सकते हैं कि मृग मरीचिका में दिखने वाला जल प्रचुर मात्रा में वास्तव में मौजूद नहीं है, यह मात्र एक स्वप्न मात्र है, यद्यपि वास्तविक जल कहीं और मौजूद हो। उसी प्रकार, पदार्थ के भीतर घर, सुख और वास्तविकता के दर्शन निश्चित रूप से एक मूर्खतापूर्ण स्वप्न से बेहतर नहीं है जिसमें बार-बार दुख प्रकट होते हैं।

फिर भी, एक दूसरे अर्थ में, यह ब्रह्मांड वास्तविक है। वेदान्त-सूत्र पर अपनी टीका में, श्रील माध्वाचार्य ने वैदिक श्रुति-मंत्रों से निम्नलिखित कथन उद्धृत करके इसकी पुष्टि की है: सत्यं ह्य एवेदं विश्वं असृजत। "भगवान द्वारा बनाया गया यह ब्रह्मांड वास्तविक है।" वेदों का पूर्ण अधिकार इस प्रकार इस ब्रह्मांड को वास्तविक होने का प्रमाणित करता है; फिर भी, क्योंकि हमारे ज्ञान को भ्रम (जैसा कि यहां अष्टा-धिषणम शब्दों द्वारा इंगित किया गया है) द्वारा चुरा लिया गया है, हम इस ब्रह्मांड या उस परम प्रभु को ठीक से समझ नहीं सकते हैं जिसने इसे बनाया है। भगवान कृष्ण के विस्तार के रूप में, ब्रह्मांड वास्तविक है और उनकी सेवा में व्यस्त रहने के लिए है। जो व्यक्ति भगवान के राज्य को घर के रूप में स्वीकार करता है, स्वयं भगवान को प्रेम की वस्तु के रूप में, और भौतिक ब्रह्मांड भगवान की सेवा में व्यस्त रहने के लिए सामग्री के रूप में स्वीकार करता है वह शाश्वत वास्तविकता के भीतर निवास करता है जहां भी वह भौतिक और आध्यात्मिक दुनिया में जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)