श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.14.1 
श्रीब्रह्मोवाच
नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय
गुञ्जावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय ।
वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु-
लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मा ने कहा: हे प्रभु, आप ही एकमात्र पूजनीय भगवान हैं, अतः आपको प्रसन्न करने के लिए मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ और आपकी स्तुति करता हूँ। हे ग्वालों के राजा के पुत्र, आपका दिव्य शरीर एक नए बादल की तरह गहरा नीला है, आपका वस्त्र बिजली की तरह चमकदार है और आपके चेहरे की सुंदरता आपके गुंजा के झुमकों और आपके सिर पर मोर पंख से और बढ़ जाती है। कई जंगली फूलों और पत्तियों की माला पहने हुए और चरवाहे की छड़ी, भैंसे का सींग और बांसुरी से सुसज्जित आप अपने हाथ में भोजन का एक टुकड़ा लेकर खूबसूरती से खड़े हैं।
 
Brahma said: O Lord, you are the only worship-worthy God; therefore, to please you, I offer my respectful obeisances unto you and offer my praises unto you. O son of the king of cowherds, your transcendental body is deep blue like the fresh clouds; your clothes are resplendent like lightning, and the beauty of your face is enhanced by your earrings made of gunja and the peacock feather on your head. Wearing a garland of many wild flowers and leaves, and adorned with a shepherding stick, horn and flute, you stand beautifully with a morsel of food in your hand.
तात्पर्य
पिछले अध्याय में ब्रह्मा, ब्रह्मांड के निर्माता, ने सुप्रीम पर्सनैलिटी ऑफ गॉडहेड, भगवान कृष्ण को उनके ग्वाला साथी चरवाहों और बछड़ों को चुराकर चकित करने का प्रयास किया था। लेकिन कृष्ण के अपने रहस्यमय शक्ति के एक मामूली प्रदर्शनी से, ब्रह्मा खुद पूरी तरह से हैरान थे, और अब बहुत विनम्रता और भक्ति से वह भगवान को अपने विनम्र प्रणाम और प्रार्थना प्रदान करते हैं।

इस श्लोक में कवाला शब्द उस चावल के दाने को संदर्भित करता है जिसे कृष्ण ने अपने बाएं हाथ में दही के साथ मिश्रित किया था। सनातन गोस्वामी के अनुसार, भगवान ने एक गाय को चराने वाली छड़ी और एक भैंस का सींग अपने बाएं बाजू के नीचे दबाया हुआ था, और उनकी बांसुरी उनकी बेल्ट के नीचे रखी गई थी। सुंदर युवा कृष्ण, बहुरंगी वन खनिजों से सजे हुए, वैकुंठ की संपत्ति से कहीं अधिक संपन्नता का प्रदर्शन करते थे। यद्यपि ब्रह्मा ने भगवान के असंख्य चार हाथ वाले रूप देखे थे, लेकिन अब उन्होंने कृष्ण के दो हाथ वाले रूप के चरण कमलों में आत्मसमर्पण कर दिया, जो नंद महाराज के पुत्र के रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा ने अपनी प्रार्थनाएँ उस मूर्ति को अर्पित कीं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)