कृष्ण की ऊर्जा - उनकी माया-शक्ति या स्वरूप-शक्ति - एक है, लेकिन यह विविध रूपों में प्रकट होती है। परस्य शक्ति विविधैव श्रूयते (श्वेताश्वतर उपनिषद 6.8)। वैष्णवों और मायावादियों के बीच अंतर यह है कि मायावादी कहते हैं कि यह माया एक है, जबकि वैष्णव इसकी विविधताओं को पहचानते हैं। विविधता में एकता होती है। उदाहरण के लिए, एक पेड़ में, पत्तियों, फलों और फूलों की विविधता होती है। सृष्टि के भीतर विभिन्न प्रकार की गतिविधि करने के लिए ऊर्जा की विविधता की आवश्यकता होती है। एक और उदाहरण देने के लिए, एक मशीन में सभी भाग लोहे के हो सकते हैं, लेकिन मशीन में विविध गतिविधियाँ शामिल होती हैं। यद्यपि पूरी मशीन लोहे की है, एक भाग एक तरह से काम करता है और दूसरे भाग दूसरे तरीके से काम करते हैं। जो व्यक्ति नहीं जानता कि मशीन कैसे काम कर रही है, वह कह सकता है कि यह सब लोहा है; फिर भी, लोहे के होने के बावजूद, मशीन में अलग-अलग तत्व होते हैं, जो सभी उस उद्देश्य को पूरा करने के लिए अलग-अलग तरीके से काम करते हैं जिसके लिए मशीन बनाई गई थी। एक पहिया इस तरह से चलता है, दूसरा पहिया उस तरह से चलता है, स्वाभाविक रूप से इस तरह से काम करता है कि मशीन का काम चलता रहे। परिणामस्वरूप हम मशीन के विभिन्न भागों को अलग-अलग नाम देते हैं, यह कहते हुए, "यह एक पहिया है," "यह एक पेंच है," "यह एक धुरी है," "यह स्नेहन है," और इसी तरह। इसी तरह, जैसा कि वेदों में बताया गया है:
परास्य शक्ति विविधैव श्रूयते
स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च
कृष्ण की शक्ति विविध है, और इस प्रकार एक ही शक्ति या क्षमता विविध तरीकों से काम करती है। विविधा का अर्थ है "विविधता"। विविधता में एकता होती है। इस प्रकार योग-माया और महा-माया एक ही शक्ति के विविध व्यक्तिगत भागों में से हैं, और ये सभी व्यक्तिगत शक्तियाँ अपने विविध तरीकों से काम करती हैं। संविद, संधिनी और आह्लादिनी शक्तियां - अस्तित्व के लिए कृष्ण की शक्ति, ज्ञान के लिए उनकी शक्ति और सुख के लिए उनकी शक्ति - योग-माया से अलग हैं। प्रत्येक एक व्यक्तिगत शक्ति है। आह्लादिनी शक्ति राधारानी हैं। जैसा कि स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने समझाया है, राधा कृष्ण-प्रणय-विकृतिर्ह्लादिनी शक्ति अस्मात (चैतन्य चरितामृत आदि 1.5)। आह्लादिनी-शक्ति राधारानी के रूप में प्रकट होती है, लेकिन कृष्ण और राधारानी एक ही हैं, यद्यपि एक शक्तिशाली है और दूसरा शक्ति है।
ब्रह्मा कृष्ण के वैभव (निज-महिमानी) के विषय में बहुत भ्रमित था क्योंकि इस वैभव में अतार्क्य था जो कि अकल्पनीय था। अपने सीमित ज्ञान से कोई भी उस चीज पर तर्क नहीं कर सकता जो अकल्पनीय है। इसलिए अकल्पनीय को अचिन्त्य कहा गया है जो कि हमारी सोच और तर्कों से परे है। अचिन्त्य उस चीज को दर्शाता है जिसे हम समझ नहीं सकते बल्कि उसे स्वीकार करना होता है। श्रील जीव गोस्वामी ने कहा है कि जब तक हम परमात्मा में अचिन्त्य को स्वीकार नहीं करेंगे तब तक हम ईश्वर की अवधारणा में निवास नहीं कर सकते। हमें इसे समझना होगा। इसलिए हम कहते हैं कि शास्त्र के शब्दों को जैसे हैं वैसे ही लेना चाहिए, उनमें बदलाव नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि वे हमारे तर्कों से परे हैं। अचिन्त्याः खलु ये भाव न ताँस्तर्केण योजयेत् : “जो अचिन्त्य हैं, उन्हें तर्कों के आधार पर निर्धारित नहीं किया जा सकता।” आमतौर पर लोग तर्क करते हैं लेकिन हमारी प्रक्रिया तर्क करने की नहीं बल्कि वैदिक ज्ञान को उसी तरह स्वीकार करने की है। जब कृष्ण कहते हैं, “यह श्रेष्ठ है और यह हीन है” तो हम वही स्वीकार करते हैं जो वह कहते हैं। ऐसा नहीं है कि हम तर्क करते हैं, “क्यों यह श्रेष्ठ है और दूसरा हीन है?” अगर कोई तर्क करता है तो उसके लिए ज्ञान खो जाता है। स्वीकार करने के इस मार्ग को अवरोह-पन्था कहा जाता है। अवरोह शब्द का मतलब अवतार शब्द से संबंधित है जिसका मतलब होता है “जो नीचे उतरता है”। भौतिकवादी हर चीज को आरोह-पन्था से समझना चाहता है - तर्क और तर्क क्षमता से - लेकिन दिव्य मामलों को इस तरह से नहीं समझा जा सकता। बल्कि, व्यक्ति को अवरोह-पन्था का अनुसरण करना चाहिए, ज्ञान को नीचे उतारने की प्रक्रिया। इसलिए व्यक्ति को परंपरा प्रणाली को स्वीकार करना होगा। और सबसे श्रेष्ठ परंपरा वह है जो कृष्ण से शुरू होती है (एवं परंपरा-प्राप्तम)। कृष्ण जो कहते हैं, हमें उसे स्वीकार करना चाहिए (इमं राजर्षयो विदुः)। इसे अवरोह-पन्था कहा जाता है। हालाँकि, ब्रह्मा ने आरोह-पन्था को अपनाया। वह कृष्ण की रहस्यमयी शक्ति को अपनी सीमित, समझ में आने वाली शक्ति से समझना चाहता था, और इसलिए वह स्वयं भ्रमित था। हर कोई अपने खुद के ज्ञान में खुशी ढूंढना चाहता है, यह सोचकर, “मैं कुछ जानता हूँ"। लेकिन कृष्ण की उपस्थिति में यह अवधारणा नहीं ठहर सकती है, क्योंकि व्यक्ति कृष्ण को प्रकृति की सीमाओं के भीतर नहीं ला सकता। व्यक्ति को समर्पण करना होता है। कोई दूसरा विकल्प नहीं है। न ताँस्तर्केण योजयेत्। यह समर्पण कृष्ण-भक्तों और मायावादियों के बीच का अंतर बताता है। अतत-निरसन पद निरर्थक चीजों को त्यागने को दर्शाता है। (अतत का अर्थ होता है “जो तथ्य नहीं है”।) ब्रह्म को कभी-कभी अस्थूल अण्व अह्रस्व अदीर्घम के तौर पर वर्णित किया जाता है, “जो बड़ा नहीं है और छोटा नहीं है, छोटा नहीं है और लंबा नहीं है।” (बृहद-अरण्यक उपनिषद 5.8.8) नेति नेति : “यह यह नहीं है, यह वह नहीं है।” लेकिन यह क्या है? पेंसिल का वर्णन करते समय, शायद कोई यह कहे, “यह यह नहीं है; यह वह नहीं है” लेकिन इससे यह नहीं पता चलता कि यह क्या है। इसे नेगेशन से परिभाषा कहा जाता है। भगवत गीता में, कृष्ण भी आत्मा को नेगटिव परिभाषाएँ देकर समझाते हैं। न जायते म्रियते वा : “इसका जन्म नहीं होता, यह मरता भी नहीं। आप इससे ज्यादा समझ ही नहीं सकते।” लेकिन यह क्या है? यह शाश्वत है। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यामाने शरीरे : “यह अजन्मा, शाश्वत, सदैव विद्यमान, अमृत और आदिम है। शरीर के मारे जाने पर भी इसकी हत्या नहीं की जाती।” (भगवद गीता 2.20) शुरुआत में, आत्मा को समझना मुश्किल होता है, और इसलिए कृष्ण ने नेगटिव परिभाषाएँ दी हैं :
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि
नैनं दहति पावकः
न चैनं क्लेदयन्त्यापो
न शोषयति मारुतः
“आत्मा को कभी भी किसी हथियार से टुकड़े-टुकड़े नहीं किया जा सकता, न ही इसे आग से जलाया जा सकता है, न ही पानी से भिगोया जा सकता है, न ही हवा से सुखाया जा सकता है।” (भगवद गीता 2.23) कृष्ण कहते हैं, “इसे आग से नहीं जलाया जा सकता।” इसलिए, व्यक्ति को कल्पना करनी होगी कि वह क्या है जो आग से नहीं जलाया जा सकता। यह एक नेगेटिव परिभाषा है।
