नायं आत्मा प्रवचनेन लभ्यो
ना मेधसा ना बहुना श्रुतेन
यम वैष वृणुते तेन लभ्य:
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुम् स्वाम्
"निपुण व्याख्याओं, विशाल बुद्धि या बहुत अधिक सुनने से सर्वोच्च भगवान को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। वह केवल उसी व्यक्ति द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जिसे वह खुद चुनते हैं। ऐसे व्यक्ति को ही वह अपना रूप प्रकट करते हैं।"
ब्रह्म का एक वर्णन इस प्रकार दिया गया है: सत्यं ब्रह्म, आनंद-रूपम्: "ब्रह्म परम सत्य और पूर्ण आनंद है।" विष्णु, परम ब्रह्म, के रूप एक थे, लेकिन वे अलग-अलग रूपों में प्रकट हुए। हालाँकि, उपनिषदों के अनुयायी ब्रह्म द्वारा प्रकट की गई विविधताओं को समझ नहीं सकते हैं। इससे यह साबित होता है कि ब्रह्म और परमात्मा को वास्तव में केवल भक्ति के माध्यम से ही समझा जा सकता है, जैसा कि स्वयं भगवान ने श्रीमद-भागवतम में पुष्टि की है: भक्त्याहम् एकया ग्रह्यः (भागवत 11.14.21)। यह स्थापित करने के लिए कि ब्रह्म का वास्तव में दिव्य रूप है, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर शास्त्रों से विभिन्न उद्धरण देते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद (3.8) में, सर्वोच्च को आदित्य-वर्णं तमसः परस्तात: के रूप में वर्णित किया गया है: "जिसका स्व-प्रकट रूप सूर्य के समान प्रकाशमान है और अज्ञान के अंधकार से परे है।" आनंद-मात्रं अजरं पुराणं एकं संतं बहुधा दृश्यमानम्: "सर्वोच्च आनंदमय है, जिसमें दुख का कोई अंश नहीं है। यद्यपि वह सबसे पुराने हैं, फिर भी वह कभी बूढ़े नहीं होते हैं, और यद्यपि एक हैं, फिर भी विभिन्न रूपों में अनुभव किए जाते हैं।" सर्वे नित्या: शाश्वताश्च देहा: तस्य परात्मन: "उस परम पुरुष के सभी रूप शाश्वत हैं।" (महा-वरह पुराण) सर्वोच्च पुरुष का एक रूप है, जिसमें हाथ और पैर और अन्य व्यक्तिगत विशेषताएं हैं, लेकिन उनके हाथ और पैर भौतिक नहीं हैं। भक्त जानते हैं कि कृष्ण रूप, या ब्रह्म, सर्वथा भौतिक नहीं है। बल्कि, ब्रह्म का एक दिव्य रूप है, और जब व्यक्ति उसमें लीन हो जाता है, तो भक्ति में पूर्ण रूप से विकसित होकर, वह उसे समझ सकता है (प्रेमाणजन-चुरित-भक्ति-विलोचनेन)। हालाँकि, मायावादी इस दिव्य रूप को नहीं समझ सकते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि यह भौतिक है।
अपने व्यक्तित्व में परम भगवान के दिव्य रूप इतने महान हैं कि उपनिषदों के अवैयक्तिक अनुयायी उन्हें समझने के लिए ज्ञान के मंच तक नहीं पहुँच सकते हैं। विशेष रूप से, भगवान के दिव्य रूप अवैयक्तिकवादियों की पहुँच से परे हैं, जो केवल उपनिषदों के अध्ययन के माध्यम से समझ सकते हैं कि परम सत्य पदार्थ नहीं है और वह परम सत्य सीमित शक्ति द्वारा भौतिक रूप से प्रतिबंधित नहीं है।
हालांकि कृष्ण को उपनिषदों के माध्यम से नहीं देखा जा सकता है, कुछ स्थानों में यह कहा गया है कि कृष्ण को वास्तव में इस तरह से जाना जा सकता है। औपनिषदं पुरुषम्: "वह उपनिषदों द्वारा जाना जाता है।" इसका मतलब यह है कि जब व्यक्ति वैदिक ज्ञान से पवित्र हो जाता है, तो उसे भक्तिमय समझ में प्रवेश करने की अनुमति दी जाती है (मद-भक्तिं लभते परम्)।
तच्छ्रद्धधाना मुनी:
ज्ञान-वैराग्य-युक्तया
पश्यन्त्य ात्मनि चात्मानम्
भक्त्या श्रुत-गृहीतया
"ज्ञान और वैराग्य से अच्छी तरह से सुसज्जित गंभीर जिज्ञासु छात्र या ऋषि, वैदांत-श्रुति से जो कुछ उन्होंने सुना है उसके संदर्भ में भक्ति सेवा प्रदान करके परम सत्य का एहसास करते हैं।" (भागवत 1.2.12) शब्द श्रुत-गृहीतया वैदांत ज्ञान को संदर्भित करता है, भावुकता को नहीं। श्रुत-गृहीत ध्वनि ज्ञान है।
भगवान विष्णु, ब्रह्मा ने इस तरह जाना, सत्य, ज्ञान और आनंद के भंडार हैं। वे इन तीनों पारलौकिक विशेषताओं का संयोजन हैं, और वे उपनिषदों के अनुयायियों की पूजा का विषय हैं। ब्रह्मा ने महसूस किया कि गायों, लड़कों और बछड़ों के सभी विभिन्न रूप जो विष्णु रूपों में परिवर्तित हो गए थे, उस रहस्यवाद से रूपांतरित नहीं हुए थे कि एक योगी या देवता अपने में निवेश की गई विशिष्ट शक्तियों द्वारा प्रदर्शित कर सकता है। विष्णु-मूर्तियों, या विष्णु रूपों में रूपांतरित होने वाली गायों, बछड़ों और लड़कों में विष्णु-माया या विष्णु ऊर्जा का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वे स्वयं विष्णु थे। विष्णु और विष्णु-माया की संबंधित योग्यताएं आग और गर्मी की तरह हैं। गर्मी में आग की योग्यता होती है, अर्थात् गर्माहट; और फिर भी गर्मी आग नहीं है। लड़कों, गायों और बछड़ों के विष्णु रूपों का प्रकटीकरण गर्मी की तरह नहीं था, बल्कि आग की तरह था - वे वास्तव में सभी विष्णु थे। तथ्यतः, विष्णु की योग्यता पूर्ण सत्य, पूर्ण ज्ञान और पूर्ण आनंद है। भौतिक वस्तुओं के साथ एक और उदाहरण दिया जा सकता है, जो कई, कई रूपों में परिलक्षित हो सकता है। उदाहरण के लिए, सूर्य कई जल-पात्रों में परिलक्षित होता है, लेकिन कई पात्रों में सूर्य के प्रतिबिंब वास्तव में सूर्य नहीं होते हैं। पात्र में सूर्य से कोई वास्तविक ताप और प्रकाश नहीं होता है, हालांकि यह सूर्य के रूप में प्रकट होता है। लेकिन कृष्ण द्वारा ग्रहण किए गए प्रत्येक और हर एक रूप पूर्णतः विष्णु थे। हमें श्रीमद-भागवतम पर यथासंभव प्रतिदिन चर्चा करनी चाहिए, और फिर सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा, क्योंकि भागवतम सभी वैदिक साहित्य का सार है (निगम-कल्प-तरोर गळितम फलम)। यह व्यासदेव (महा-मुनी-कृते) द्वारा लिखा गया था जब उन्हें आत्म-साक्षात्कार हुआ था। इस प्रकार हम जितना अधिक श्रीमद-भागवतम को पढ़ेंगे, उतना ही उसका ज्ञान स्पष्ट होता जाएगा। प्रत्येक छंद पारलौकिक है।
