श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  10.12.5 
मुष्णन्तोऽन्योन्यशिक्यादीन्ज्ञातानाराच्च चिक्षिपु: ।
तत्रत्याश्च पुनर्दूराद्धसन्तश्च पुनर्ददु: ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
सारे ग्वालबाल एक-दूसरे के खाने की पोटलियाँ आपस में चुराते थे। जब कोई बालक को पता चलता कि उसकी पोटली चुरा ली गयी है, तो दूसरे बालक उसे कहीं दूर उछाल देते और वहाँ पर खड़े बालक उसे और भी दूर उछाल देते थे। जब पोटली का मालिक निराश हो जाता तो दूसरे बालक हँसते और मालिक रो देता तब वह पोटली उसे वापस दे देते थे।
 
All the cowherd boys started stealing each other's breakfast packets. When a boy would realize that his packet has been stolen, the other boys would throw it away and the boys standing there would throw it even further away. When the owner of the packet would get disappointed, the other boys would laugh and the owner would cry, then the packet would be returned to him.
तात्पर्य
लड़कों में इस तरह का चोरी-छिपे खेलना और चुराना आज भी भौतिक जगत में प्रचलित है क्योंकि इस तरह के खेल-तमाशे का सुख आध्यात्मिक जगत में विद्यमान है, जिससे इस तरह के आनंद की संकल्पना निकलती है। जनमाद्यस्य यतः (वेदान्त-सूत्र 1.1.2)। ऐसा ही आनंद कृष्ण और उनके सहयोगियों द्वारा आध्यात्मिक जगत में प्रदर्शित किया जाता है, लेकिन वहां यह आनंद अनश्वर है, जबकि भौतिक क्षेत्र में यह अस्थायी है; वहां आनंद ब्रह्म है, जबकि यहां आनंद जड़ है। कृष्ण भावनामृत आंदोलन का उद्देश्य है कि मनुष्य को जड़ से ब्रह्म में स्थानांतरित होने की शिक्षा दी जाए, क्योंकि मानव जीवन का उद्देश्य यही है। अथातो ब्रह्म जिज्ञासा (वेदान्त-सूत्र 1.1.1)। कृष्ण हमें यह सिखाने के लिए आते हैं कि हम आध्यात्मिक दुनिया में उनके साथ आध्यात्मिक मंच पर कैसे आनंद ले सकते हैं। न केवल वह आते हैं, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से वृंदावन में अपनी लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं और लोगों को आध्यात्मिक आनंद की ओर आकर्षित करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)