श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  10.12.43 
वयं धन्यतमा लोके गुरोऽपि क्षत्रबन्धव: ।
वयं पिबामो मुहुस्त्वत्त: पुण्यं कृष्णकथामृतम् ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे प्रभु, मेरे आध्यात्मिक गुरु, यद्यपि हम क्षत्रियों में सबसे निम्न हैं, फिर भी हम भाग्यशाली हैं और लाभान्वित हुए हैं क्योंकि हमें आपसे भगवान् के अमृतमय पवित्र कृत्यों को लगातार सुनने का अवसर प्राप्त हुआ है।
 
O Lord, O my spiritual master, although we are the lowest of the ksatriyas, yet we are fortunate to have the advantage of having the opportunity of constantly hearing from you the nectar-like sacred activities of the Lord.
तात्पर्य
भगवान के पवित्र कार्य बहुत ही गुप्त हैं। ऐसे कार्य सामान्यतः लोगों के सुनने को नहीं मिलते, जब तक कि वे अति ही भाग्यशाली न हों। परीक्षित महाराज ने स्वयं को क्षत्र-बंधु कहा, जिसका अर्थ है "क्षत्रियों में सबसे नीच"। क्षत्रियों के गुणों का वर्णन भगवद गीता में किया गया है, और यद्यपि क्षत्रियों का सामान्य गुण ईश्वर-भाव होता है, यानी शासन करने की प्रवृत्ति, परंतु क्षत्रिय का ब्राह्मणों पर शासन नहीं करना चाहिए। इसलिए महाराज परीक्षित इस बात पर पछता रहे थे कि वह ब्राह्मणों पर शासन करना चाहते थे और इसलिए उन्हें श्राप मिला था। वह स्वयं को क्षत्रियों में सबसे नीच मानते थे। दानम ईश्वर-भावश्च क्षत्रं कर्म स्वभावजम् (गीता 18.43)। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महाराज परीक्षित में क्षत्रियों के अच्छे गुण थे, परंतु एक भक्त के रूप में उन्होंने स्वयं को, समर्पण और विनम्रता के साथ, ब्राह्मण के गले में मृत सांप लपेटने के अपने कृत्य को याद करते हुए, क्षत्रियों में सबसे नीच के रूप में प्रस्तुत किया। एक छात्र और शिष्य को गुरु से किसी भी गोपनीय सेवा के बारे में पूछने का अधिकार है, और गुरु का यह कर्तव्य है कि वह अपने शिष्यों को इन गोपनीय मामलों के बारे में विस्तार से बताए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)