श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  10.12.33 
पीनाहिभोगोत्थितमद्भ‍ुतं मह-
ज्ज्योति: स्वधाम्ना ज्वलयद् दिशो दश ।
प्रतीक्ष्य खेऽवस्थितमीशनिर्गमं
विवेश तस्मिन् मिषतां दिवौकसाम् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
विशालकाय अजगर के शरीर से एक चमकदार तेज निकला, जिसने सभी दिशाओं को प्रकाशित कर दिया। यह तेज आकाश में तब तक अकेला रहा, जब तक कि कृष्ण शव के मुंह से बाहर नहीं आ गए। उसके बाद, जैसे ही सभी देवताओं ने देखा, यह तेज कृष्ण के शरीर में प्रवेश कर गया।
 
A bright effulgence came out of the body of that huge python, illuminating all directions, and remained alone in the sky until Krishna came out of the mouth of that corpse. Then all the gods saw this effulgence entering Krishna's body.
तात्पर्य
जैसे कि जाहिर तौर पर कृष्ण से मिलने के कारण अघासुर नामक सर्प को कृष्ण के शरीर में प्रविष्ट होकर मुक्ति मिल गई। कृष्ण के शरीर में प्रवेश करने को सायुज्य-मुक्ति कहा जाता है, परन्तु बाद की पंक्तियों से यह सिद्ध होता है कि दन्तवक्र और अन्य की ही तरह अघासुर को सारूप्य-मुक्ति मिली। इसका विस्तृत वर्णन श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने श्रील जीव गोस्वामी के वैष्णव-तोषाणी से सम्बन्धित संदर्भों के साथ किया है। विष्णु जैसे ही चार हाथों वाले रूप के साथ बैकुंठ ग्रह पर रहने के योग्य बनने के कारण अघासुर को सारूप्य-मुक्ति प्राप्त हुई। ऐसा कैसे हो सका, इसका सारांश इस तरह है।

इस सर्प के शरीर से तेज निकला और शुद्ध हो गया, इस प्रकार आध्यात्मिक शुद्ध-सत्व, भौतिक दोषों से मुक्ति पा प्राप्त हुआ, क्योंकि कृष्ण ने इस सर्प की मृत्यु के बाद भी इसके शरीर में वास किया था। किसी को संदेह हो सकता है कि शरारतों से भरा हुआ ऐसा दैत्य सारूप्य या सायुज्य मुक्ति कैसे प्राप्त कर सकता है और इस पर आश्चर्य हो सकता है। परन्तु कृष्ण इतने दयालु हैं कि ऐसे संदेहों को दूर करने के लिए उन्होंने सभी देवताओं की उपस्थिति में सर्प की इस तेज को या सर्प के व्यक्तिगत जीवन को कुछ समय तक उसके व्यक्तित्व में ही रहने दिया।

कृष्ण पूर्ण तेज हैं और प्रत्येक जीवधार वह तेज का ही एक अंश है। जैसा कि यहाँ सिद्ध किया गया है, प्रत्येक जीवधार का तेज व्यक्तिगत होता है। कुछ समय तक वह तेज दैत्य के शरीर से बाहर, निजी रूप से रहा और समूचे तेज अर्थात् ब्रह्मज्योति से नहीं मिला। ब्रह्म तेज भौतिक आँखों से दिखाई नहीं देता है, परन्तु यह सिद्ध करने के लिए कि प्रत्येक जीवधार व्यक्तिगत है, कृष्ण ने उस व्यक्तिगत तेज को सभी द्वारा देखे जाने के लिए, कुछ समय तक दैत्य के शरीर के बाहर रहने दिया। फिर कृष्ण ने यह सिद्ध किया कि वह चाहे ही क्यों न मारें, प्रत्येक को सायुज्य, सारूप्य, सामीप्य या जो भी उस तरह की मुक्ति प्राप्त होती ही है।

परन्तु जो लोग प्रेम और स्नेह के आध्यात्मिक स्तर पर होते हैं, उनकी मुक्ति विमुक्ति अर्थात् अद्भुत मुक्ति ही होती है। इस प्रकार, पहले तो यह सर्प स्वयं कृष्ण के शरीर में प्रविष्ट हुआ और ब्रह्म तेज के साथ मिल गया। इस मिलन को सायुज्य-मुक्ति कहते हैं। परन्तु बाद की पंक्तियों से हमें पता चलता है कि अघासुर को सारूप्य-मुक्ति प्राप्त हुई। पद 38 यह समझाता है कि अघासुर को विष्णु के समान शरीर मिला और उसके बाद वाली पंक्ति भी यह स्पष्ट कहती है कि उसे नारायण जैसे पूर्ण आध्यात्मिक शरीर की प्राप्ति हुई। इसलिए भागवतम ने दो या तीन स्थानों पर यह पुष्टि की है कि अघासुर को सारूप्य-मुक्ति मिली। फिर कोई यह तर्क कर सकता है कि वह ब्रह्म तेज के साथ कैसे मिल गया? उत्तर यह है कि जैसे जय और विजय ने तीन जन्मों के बाद ही फिर से सारूप्य-मुक्ति और भगवान् के साथ सहवास प्राप्त किया था, उसी प्रकार अघासुर को भी वैसी ही मुक्ति मिली।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)