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bhagavat 10.12.31: तब, क्योंकि कृष्ण ने अपने शरीर का आकार बढ़ा दिया था, इसलिए राक्षस ने अपने शरीर को बहुत बड़ा कर लिया। फिर भी, उसकी सांस रुक गई, उसका दम घुट गया और उसकी आंखें इधर-उधर घूमने लगीं और बाहर निकल आईं। परंतु राक्षस की प्राण वायु किसी भी छेद से नहीं निकल पा रही थी, और इसलिए अंत में राक्षस के सिर के ऊपर के छेद से बाहर निकल पड़ी।   |   bhagavat अध्याय 10.12: अघासुर का वध   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  10.12.31 
ततोऽतिकायस्य निरुद्धमार्गिणो
ह्युद्गीर्णद‍ृष्टेर्भ्रमतस्त्वितस्तत: ।
पूर्णोऽन्तरङ्गे पवनो निरुद्धो
मूर्धन् विनिर्भिद्य विनिर्गतो बहि: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
तब, क्योंकि कृष्ण ने अपने शरीर का आकार बढ़ा दिया था, इसलिए राक्षस ने अपने शरीर को बहुत बड़ा कर लिया। फिर भी, उसकी सांस रुक गई, उसका दम घुट गया और उसकी आंखें इधर-उधर घूमने लगीं और बाहर निकल आईं। परंतु राक्षस की प्राण वायु किसी भी छेद से नहीं निकल पा रही थी, और इसलिए अंत में राक्षस के सिर के ऊपर के छेद से बाहर निकल पड़ी।
 
Since Krishna had increased the size of his body, the demon enlarged his body considerably. Yet his breathing stopped, he suffocated and his eyes began to roll around and pop out. But the demon's life was not able to escape through any hole, so finally it burst out through the hole on the top of his head.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)