श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  10.12.30 
तच्छ्रुत्वा भगवान्कृष्णस्त्वव्यय: सार्भवत्सकम् ।
चूर्णीचिकीर्षोरात्मानं तरसा ववृधे गले ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
जब अजेय भगवान कृष्ण, देवताओं को बादलों के पीछे से "हाय, हाय!" पुकारते सुनकर तुरंत ही अपने और अपने ग्वालबाल की रक्षा के लिए, जिसे वो चूर-चूर करना चाहता था, उस दानव के गले के भीतर अपना विस्तार कर लिया।
 
When the invincible Lord Krishna heard the demigods crying out from behind the clouds, He immediately expanded Himself inside the throat of the demon to save Himself and His fellow cowherd boys from the demon who wanted to crush them to powder.
तात्पर्य
ऐसे ही हैं कृष्ण के कार्य। परिवित्राणाय साधूनाम् विनाशायच दुष्कृताम् (भगवद्गीता 4.8)। दानव के गले के भीतर स्वयं को विस्तारित कर, कृष्ण ने उसकी साँस घोंटकर उसकी हत्या कर दी और उसी समय स्वयं और अपने सहयोगियों को आसन्न मृत्यु से बचाया और देवताओं को भी विलाप से बचाया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)