इत्थं मिथोऽतथ्यमतज्ज्ञभाषितं
श्रुत्वा विचिन्त्येत्यमृषा मृषायते ।
रक्षो विदित्वाखिलभूतहृत्स्थित:
स्वानां निरोद्धुं भगवान् मनो दधे ॥ २५ ॥
अनुवाद
हर व्यक्ति के हृदय में स्थित अन्तर्यामी परमात्मा श्री कृष्ण ने बालकों को आपस में नकली साँप के बारे में बातें करते सुना। यह नहीं जानते हुए कि नकली साँप के वेश में वास्तव में अघासुर था, एक दानव जो अजगर के रूप में प्रकट हुआ था, कृष्ण, जो इस बारे में जानते थे, अपने मित्रों को राक्षस के मुँह में प्रवेश करने से रोकना चाहते थे।
हर व्यक्ति के हृदय में स्थित अन्तर्यामी परमात्मा श्री कृष्ण ने बालकों को आपस में नकली साँप के बारे में बातें करते सुना। यह नहीं जानते हुए कि नकली साँप के वेश में वास्तव में अघासुर था, एक दानव जो अजगर के रूप में प्रकट हुआ था, कृष्ण, जो इस बारे में जानते थे, अपने मित्रों को राक्षस के मुँह में प्रवेश करने से रोकना चाहते थे।