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bhagavat 10.12.17: उसका निचला होठ पृथ्वी पर टिका था और ऊपरी होठ आकाश के मेघों से जा लगा था। उसके मुँह के किनारे बड़े पर्वत की गुफा की भाँति थे और बीच वाला भाग घनघोर अन्धकारमय था। उसकी जीभ चौड़े यातायात मार्ग के समान थी, उसका श्वास गर्म हवा के समान था और उसकी आँखें आग की लपटों के समान जल रही थीं।   |   bhagavat अध्याय 10.12: अघासुर का वध   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.12.17 
धराधरोष्ठो जलदोत्तरोष्ठो
दर्याननान्तो गिरिश‍ृङ्गदंष्ट्र: ।
ध्वान्तान्तरास्यो वितताध्वजिह्व:
परुषानिलश्वासदवेक्षणोष्ण: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
उसका निचला होठ पृथ्वी पर टिका था और ऊपरी होठ आकाश के मेघों से जा लगा था। उसके मुँह के किनारे बड़े पर्वत की गुफा की भाँति थे और बीच वाला भाग घनघोर अन्धकारमय था। उसकी जीभ चौड़े यातायात मार्ग के समान थी, उसका श्वास गर्म हवा के समान था और उसकी आँखें आग की लपटों के समान जल रही थीं।
 
His lower lip was on the earth and his upper lip was touching the clouds of the sky. The sides of his face were like huge mountain caves and the middle of his face was extremely dark. His tongue was like a four-way road, his breath was like hot wind and his eyes were burning like flames of fire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)