श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.12.13 
अथाघनामाभ्यपतन्महासुर-
स्तेषां सुखक्रीडनवीक्षणाक्षम: ।
नित्यं यदन्तर्निजजीवितेप्सुभि:
पीतामृतैरप्यमरै: प्रतीक्ष्यते ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन परीक्षित, तदोपरांत वहाँ पर अघासुर नाम का एक विशालकाय दानव प्रकट हुआ, जिसकी मृत्यु की प्रतीक्षा देवता तक कर रहे थे। हालाँकि देवता प्रतिदिन अमृतपान करते थे लेकिन फिर भी वे इस महान दानव से डरते थे और उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा में थे। वन में ग्वालबालों के द्वारा मनाए जा रहे दिव्य आनंद को यह दानव सहन नहीं कर सका।
 
O King Parikshit, there then appeared a great demon named Aghasura whose death even the gods were waiting for. Although the gods drank nectar every day, they were afraid of this great demon and were waiting for his death. This demon could not tolerate the divine joy being enjoyed by the cowherd boys in the forest.
तात्पर्य
कोई यह प्रश्न पूछ सकता है कि कृष्ण के लीलाओं को कोई राक्षस कैसे बाधित कर सकता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि यद्यपि ग्वालबालों के द्वारा आनंदित किए जा रहे अलौकिक आनंद को रोका नहीं जा सकता था, जब तक कि वे अपनी विभिन्न क्रियाओं के अलौकिक आनंद को नहीं रोकते वे अपना दोपहर का भोजन नहीं कर सकते थे। इसलिए दोपहर के भोजन के समय योग-माया की व्यवस्था से अघासुर प्रकट हुआ, ताकि उस समय के लिए वे अपनी क्रियाएँ रोक सकें और दोपहर का भोजन कर सकें। विविधता में परिवर्तन आनंद की माँ है। ग्वालबाल लगातार खेलते रहते, फिर रुक जाते और फिर नए तरीके से आनंद लेते। इसलिए हर दिन एक राक्षस आता और उनके खेलकूद के आनंद को बाधित करता। राक्षस को मार दिया जाता और फिर बालक अपनी अलौकिक लीलाओं में वापस संलग्न हो जाते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)