| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ » अध्याय 11: कृष्ण की बाल-लीलाएँ » श्लोक 8 |
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| | | | श्लोक 10.11.8  | बिभर्ति क्वचिदाज्ञप्त: पीठकोन्मानपादुकम् ।
बाहुक्षेपं च कुरुते स्वानां च प्रीतिमावहन् ॥ ८ ॥ | | | | | | अनुवाद | | कभी-कभी माता यशोदा और उनकी गोपी सखियाँ कृष्ण से कहतीं, "जरा यह वस्तु तो लाओ, जरा वह वस्तु तो लाओ।" कभी वे उनको पीढ़ा लाने, तो कभी खड़ाऊँ या काठ का नपना लाने के लिए आदेश देतीं और कृष्ण माताओं के आदेश पर उन वस्तुओं को लाने का प्रयास करते। किंतु कई बार वे उन वस्तुओं को इस प्रकार छूते मानो उन्हें उठाने में असमर्थ हों और वहीं खड़े रहते। अपने सम्बन्धियों के हर्ष को बढ़ाने के लिए वे दोनों हाथों से ताल ठोंक कर दिखाते कि वे काफी बलवान हैं। | | | | कभी-कभी माता यशोदा और उनकी गोपी सखियाँ कृष्ण से कहतीं, "जरा यह वस्तु तो लाओ, जरा वह वस्तु तो लाओ।" कभी वे उनको पीढ़ा लाने, तो कभी खड़ाऊँ या काठ का नपना लाने के लिए आदेश देतीं और कृष्ण माताओं के आदेश पर उन वस्तुओं को लाने का प्रयास करते। किंतु कई बार वे उन वस्तुओं को इस प्रकार छूते मानो उन्हें उठाने में असमर्थ हों और वहीं खड़े रहते। अपने सम्बन्धियों के हर्ष को बढ़ाने के लिए वे दोनों हाथों से ताल ठोंक कर दिखाते कि वे काफी बलवान हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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