|
| |
| |
श्लोक 10.11.20  |
इत्थं यशोदा तमशेषशेखरं
मत्वा सुतं स्नेहनिबद्धधीर्नृप ।
हस्ते गृहीत्वा सहराममच्युतं
नीत्वा स्ववाटं कृतवत्यथोदयम् ॥ २० ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे महाराज परीक्षित, माँ यशोदा के सघन प्रेम और स्नेह के कारण उन्होंने सम्पूर्ण संपत्ति के शिखर पर आसीन कृष्ण को अपना पुत्र मान लिया था। इस प्रकार वे बलराम के साथ कृष्ण को हाथ से पकड़कर घर ले आईं जहाँ उनका नहलाना-धुलाना, कपड़े पहनाना और खिलाना-पिलाना का अपना काम उन्होंने पूर्ण किया। |
| |
| हे महाराज परीक्षित, माँ यशोदा के सघन प्रेम और स्नेह के कारण उन्होंने सम्पूर्ण संपत्ति के शिखर पर आसीन कृष्ण को अपना पुत्र मान लिया था। इस प्रकार वे बलराम के साथ कृष्ण को हाथ से पकड़कर घर ले आईं जहाँ उनका नहलाना-धुलाना, कपड़े पहनाना और खिलाना-पिलाना का अपना काम उन्होंने पूर्ण किया। |
| ✨ ai-generated |
| |
|