श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  10.1.43 
ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वद:समीरवेगानुगतं विभाव्यते ।
एवं स्वमायारचितेष्वसौ पुमान्गुणेषु रागानुगतो विमुह्यति ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
जब आकाश के तारे जैसे सूरज, चाँद और नक्षत्र तेल या पानी जैसे तरल पदार्थों में परावर्तित होते हैं, तो हवा के चलने के कारण ये अलग-अलग आकार में दिखते हैं - कभी गोल, कभी लम्बी, और ऐसे ही दूसरे रूपों में - इसी तरह, जब जीवित प्राणी, आत्मा भौतिकवादी विचारों में लीन रहता है, तो वह अज्ञानता के कारण विभिन्न रूपों को अपनी पहचान के रूप में स्वीकार करता है। दूसरे शब्दों में, प्रकृति के भौतिक गुणों से विचलित होने के कारण वह मानसिक संकल्पनाओं से भ्रमित हो जाता है।
 
When the stars in the sky, such as the sun, moon and stars, are reflected in liquids such as oil or water, they take on various shapes due to the velocity of the wind, sometimes round, sometimes long and sometimes something else. Similarly, when the soul is absorbed in materialistic thoughts, it accepts various forms as its identity due to ignorance. In other words, being distracted by the material modes of nature, it becomes bewildered by desires.
तात्पर्य
इस श्लोक से एक बहुत अच्छा उदाहरण मिलता है जिससे भौतिक दुनिया में शाश्वत आध्यात्मिक आत्मा की विभिन्न स्थितियों और आत्मा की विभिन्न शरीरों (देहान्तर-प्राप्तिः) को धारण करने के तरीके को समझा जा सकता है। चंद्रमा स्थिर है और एक है, लेकिन जब पानी या तेल में उसका प्रतिबिंब बनता है, तो हवाओं की गति की वजह से वह अलग-अलग आकार लेता दिखाई देता है। इसी तरह, आत्मा भगवान कृष्ण, भगवान के परम व्यक्तित्व का शाश्वत सेवक है, लेकिन जब उसे प्रकृति के भौतिक मोड में डाल दिया जाता है, तो वह विभिन्न शरीरों को ग्रहण करता है, कभी देवता के रूप में, कभी आदमी, कुत्ता, पेड़ और इसी तरह। भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की भ्रामक क्षमता माया के प्रभाव से, जीवित इकाई सोचती है कि वह यह व्यक्ति है, वह व्यक्ति है, अमेरिकी है, भारतीय है, बिल्ली है, कुत्ता है, पेड़ है या जो भी हो। इसे माया कहा जाता है। जब कोई इस भ्रम से मुक्त हो जाता है और समझ जाता है कि आत्मा इस भौतिक दुनिया के किसी भी आकार से संबंधित नहीं है, तो वह आध्यात्मिक मंच (ब्रह्म-भूत) पर स्थित होता है।

इस बोध को कभी-कभी निर्आकार या निराकारता के रूप में समझाया जाता है। हालाँकि, यह निराकारता का मतलब यह नहीं है कि आत्मा का कोई रूप नहीं है। आत्मा का रूप होता है, लेकिन बाहरी, उत्तेजित रूप जो उसने भौतिक संदूषण के कारण हासिल किया है, वह झूठा है। इसी तरह, भगवान को भी निर्आकार के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है कि भगवान का कोई भौतिक रूप नहीं है लेकिन सच्चिदानंद-विग्रह है। जीवित इकाई परम सच्चिदानंद-विग्रह का एक भाग और पार्सल है, लेकिन उसके भौतिक रूप अस्थायी या भ्रामक हैं। जीवित इकाई और सर्वोच्च भगवान दोनों के पास मूल, आध्यात्मिक रूप (सच्चिदानंद-विग्रह) होते हैं, लेकिन भगवान, सर्वोच्च, अपना रूप नहीं बदलते हैं। भगवान ऐसे ही प्रकट होते हैं जैसे वे हैं, जबकि जीवित इकाई प्रकट होती है क्योंकि भौतिक प्रकृति उसे विभिन्न रूपों को स्वीकार करने के लिए मजबूर करती है। जब जीवित इकाई को ये विभिन्न रूप प्राप्त होते हैं, तो वह अपनी मूल, आध्यात्मिक रूप से नहीं, बल्कि उनके साथ पहचान बनाती है। जैसे ही जीवित इकाई अपने मूल, आध्यात्मिक रूप और समझ में वापस लौटती है, वह तुरंत सर्वोच्च रूप, भगवान के व्यक्तित्व के सामने आत्मसमर्पण कर देती है। इसे भगवद गीता (7.19) में बताया गया है। बहुनाम जन्मनाम अन्ते ज्ञानवान् माम प्रपद्यते। जब जीवित इकाई, विभिन्न रूपों में अनेकों जन्मों के बाद, कृष्ण चेतना के अपने मूल स्वरूप में वापस आती है, तो वह तुरंत सर्वोच्च रूप, कृष्ण के चरण कमलों में आत्मसमर्पण कर देती है। यह मुक्ति है। जैसा कि भगवान ने भगवद गीता (18.54) में कहा है:

ब्रह्म-भूतः प्रसन्नत्मा

न शोचति न काङ्क्षति

समः सर्वेषु भूतेषु

मद्-भक्तिं लभते पराम्

"जो इस प्रकार पारलौकिक स्थित होता है वह तुरंत सर्वोच्च ब्रह्म का एहसास करता है और पूरी तरह से आनंदित हो जाता है। वह कभी भी विलाप नहीं करता है और न ही कुछ पाने की इच्छा करता है; वह हर जीवित इकाई के प्रति समान रूप से प्रेरित होता है। उस स्थिति में वह मुझमें शुद्ध भक्ति सेवा प्राप्त करता है।" सर्वोच्च रूप में आत्मसमर्पण भक्ति का परिणाम है। यह भक्ति, या खुद की स्थिति की समझ, पूर्ण मुक्ति है। जब तक कोई निरपेक्ष सत्य की अवैयक्तिक समझ के अधीन है, तब तक वह शुद्ध ज्ञान में नहीं है, लेकिन फिर भी उसे शुद्ध ज्ञान के लिए संघर्ष करना होगा। क्लेशोऽधिकतरस्तेषां अव्यक्तासक्ता-चेतसाम (भगवद गीता 12.5)। वैसे तो कोई आध्यात्मिक रूप से उन्नत हो सकता है, लेकिन यदि कोई निरपेक्ष सत्य के अवैयक्तिक स्वरूप से जुड़ा हुआ है, तो उसे अभी भी बहुत मेहनत करनी होगी, जैसा कि क्लेशोऽधिकतरः शब्दों द्वारा इंगित किया गया है, जिसका अर्थ है "अधिक पीड़ा"। हालाँकि, एक भक्त आसानी से एक आध्यात्मिक रूप के रूप में अपनी मूल स्थिति प्राप्त कर लेता है और भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को उनके मूल रूप में समझता है।

भगवद-गीता के दूसरे अध्याय में स्वयं कृष्ण जीवों के स्वरुप को स्पष्ट करते हैं, जहाँ वे अर्जुन से साफ़ कहते हैं कि वे, अर्जुन तथा अन्य सभी जीव पहले अपने मूल रूपों में हुआ करते थे और अब भी पृथक वैयक्तिक पहचान वाले हैं। वे पहले भी व्यक्ति थे; वे अभी भी पृथक रूप में हैं और भविष्य में भी वे सभी व्यक्तिगत स्वरूप बनाए रखेंगे। केवल यही अंतर है कि जीव विभिन्न भौतिक रूपों में प्रकट होता है, जबकि कृष्ण मूल, आध्यात्मिक रूप में प्रकट होते हैं। दुर्भाग्य से, जो लोग आध्यात्मिक ज्ञान में निष्णात नहीं हैं वे मानते हैं कि कृष्ण भी उनमें से एक हैं और उनका रूप भी उनके भौतिक रूपों जैसा है। अवाजानंति माम मुढा मानुषीं तनुमाश्रितम् (भ.ग. 9.11)। कृष्ण कभी भी भौतिक ज्ञान से घमंडी नहीं होते हैं इसलिए उन्हें अच्युत कहा जाता है, जबकि प्राणी भौतिक प्रकृति द्वारा पराजित और उत्तेजित होता है। यही ईश्वर और प्राणियों में अंतर है।

इस संबंध में यह ध्यान रखना होगा कि वसुदेव, जो आध्यात्मिक स्थिति में थे, ने कंस को आगे पापपूर्ण गतिविधियाँ न करने की सलाह दी। कंस, जो राक्षसों का प्रतिनिधि था, हमेशा भगवान कृष्ण को मारने के लिए तैयार रहता था, जबकि वसुदेव एक आध्यात्मिक स्थिति में रहने वाले व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके यहाँ कृष्ण ने जन्म लिया (वासुदेव, वसुदेव के पुत्र थे)। वसुदेव अपनी बहन को मारने के पापपूर्ण कर्म से अपने बहनोई को रोकना चाहते थे, क्योंकि भौतिक प्रकृति से उत्तेजित होने का नतीजा यह होगा कि कंस को बार-बार दुख भोगने के लिए शरीर धारण करना होगा। श्रीमद-भागवतम (5.5.4) में ऋषभदेव कहते भी हैं:

ना साधु मन्ये यतः आत्मनों यम

असन्न अपि क्लेशदा आसा देहः

जब तक जीव तथाकथित सुख और दुख की कामना वाली गतिविधियों में उलझा रहेगा, उसे खास तरह का शरीर प्राप्त होगा जिसमें भौतिक प्रकृति (त्रि-ताप-यांत्रणा) के कारण तीन तरह के दुख झेलने होंगे। इसलिए, एक बुद्धिमान व्यक्ति को भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त होकर परम पुरुष कृष्ण की सेवा में संलग्न होकर अपने मूल, आध्यात्मिक शरीर को पुनः प्राप्त करना चाहिए। जब तक कोई भौतिक रूप से जुड़ा है, उसे जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारी की प्रक्रिया को स्वीकार करना होगा। इसलिए, एक बुद्धिमान व्यक्ति को यह बताया गया है कि वह तथाकथित अच्छे और बुरे कामनात्मक गतिविधियों में उलझने के बजाय कृष्ण भावना में उन्नति करने के लिए जीवन समर्पित करे ताकि दूसरे भौतिक शरीर को स्वीकार करने के बजाय (त्याग कर देहा पुनर्जन्म नैति) वह अपने घर, ईश्वर के पास वापस लौट सके।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)