श्री गौड़-मंडल-भूमि, येवा जाने चिंतामणि,
तारा हया व्रजब भूमि वासा
"व्रजभूमि" का अर्थ है मथुरा-वृंदावन, और गौड़-मंडल-भूमि में नवद्वीप शामिल है। ये दोनों स्थान अपरिवर्तनीय हैं। इसलिए, नवद्वीप-धाम में रहने वाला कोई भी व्यक्ति, कृष्ण और श्री चैतन्य महाप्रभु को एक ही व्यक्तित्व जानकर, व्रजभूमि, मथुरा-वृंदावन में रहता है। भगवान ने संसार में बंधी आत्मा के लिए सुविधाजनक बना दिया है कि वह मथुरा, वृंदावन और नवद्वीप में रह सके और इस प्रकार भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से सीधे जुड़ सके। बस इन स्थानों में रहने से ही व्यक्ति तुरंत भगवान के संपर्क में आ सकता है। ऐसे कई भक्त हैं जो कभी भी वृंदावन और मथुरा न छोड़ने की प्रतिज्ञा करते हैं। निस्संदेह यह एक अच्छा संकल्प है, लेकिन अगर कोई भगवान की सेवा के लिए वृंदावन, मथुरा या नवद्वीप-धाम छोड़ देता है, तो वह भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से विच्छिन्न नहीं हो जाता है। किसी भी दर पर, हमें मथुरा-वृंदावन और नवद्वीप-धाम के दिव्य महत्व को समझना चाहिए। इन स्थानों में जो कोई भी भक्ति सेवा करता है, वह निश्चित रूप से शरीर त्यागने के बाद अपने घर वापस, भगवान के पास वापस जाता है। इसलिए शब्द मथुरा भगवान यत्र नित्यं सन्निहितो हरिः विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। एक भक्त को इस निर्देश का उसके सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार पूर्ण रूप से उपयोग करना चाहिए। जब भी सर्वोच्च भगवान व्यक्तिगत रूप से प्रकट होते हैं, तो वे इस स्थान के साथ अपने अंतरंग संबंध के कारण मथुरा में प्रकट होते हैं। इसलिए यद्यपि मथुरा और वृंदावन इस पृथ्वी ग्रह पर स्थित हैं, वे भगवान के दिव्य निवास हैं।
