श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.1.1 
श्रीराजोवाच
कथितो वंशविस्तारो भवता सोमसूर्ययो: ।
राज्ञां चोभयवंश्यानां चरितं परमाद्भ‍ुतम् ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
राजा परीक्षित ने कहा: हे प्रभु, आपने चन्द्रदेव तथा सूर्यदेव दोनों के राजकुलों की उनकी राजाओं के ऊंचे और आश्चर्यजनक चरित्र सहित, विस्तार से व्याख्या की है।
 
King Parikshit said: O Lord, you have described in detail the dynasties of both the Moon God and the Sun God, along with the great and wonderful characters of their kings.
तात्पर्य
नौवें सर्ग के चैबीसवें अध्याय के अंत में, शुकदेव गोस्वामी ने श्री कृष्ण की गतिविधियों का संक्षेप में वर्णन किया। उन्होंने बताया कि कैसे कृष्ण व्यक्तिगत रूप से पृथ्वी के भार को कम करने के लिए प्रकट हुए, कैसे उन्होंने एक गृहस्थ के रूप में लीलाएँ प्रदर्शित कीं, और कैसे अपने जन्म के तुरंत बाद, उन्होंने स्वयं को अपनी व्रजभूमि-लीला में स्थानांतरित कर लिया। परीक्षित महाराज, जो स्वाभाविक रूप से कृष्ण के भक्त थे, भगवान कृष्ण के बारे में और अधिक सुनना चाहते थे। इसलिए, शुकदेव गोस्वामी को कृष्ण के बारे में और बोलने और अधिक विवरण देने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए, उन्होंने कृष्ण की गतिविधियों का संक्षिप्त में वर्णन करने के लिए शुकदेव गोस्वामी को धन्यवाद दिया। शुकदेव गोस्वामी ने कहा था:

“जातो गतः पितृ-गृहाद् व्रजम् एधितार्थो

हत्वा रिपून् सुत-शतानि कृतोरुदारः

उत्पाद्य तेषु पुरुषः क्रतुभिः समीजे

आत्मानम् आत्म-निगमं प्रथाय जनेषु

“भगवान श्री कृष्ण, जिन्हें लीला-पुरुषोत्तम के रूप में जाना जाता है, वासुदेव के पुत्र के रूप में प्रकट हुए, लेकिन तुरंत अपने पिता का घर छोड़कर अपने पवित्र भक्तों के साथ अपने प्रेममय संबंधों का विस्तार करने के लिए वृंदावन चले गए। वृंदावन में प्रभु ने कई राक्षसों को मारा, और उसके बाद वह द्वारका लौट आए, जहाँ वैदिक सिद्धांतों के अनुसार उन्होंने कई पत्नियों से विवाह किया जो सबसे अच्छी महिलाएँ थीं, उनसे सैकड़ों पुत्रों को जन्म दिया, और गृहस्थ जीवन के सिद्धांतों को स्थापित करने के लिए अपनी पूजा के लिए यज्ञ किए।” (भाग. 9.24.66)

यादव वंश सोम यानी चंद्र-देव से उतरने वाले परिवार से संबंधित था। यद्यपि ग्रह प्रणालियों को इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है कि सूर्य पहले आता है, चंद्रमा से पहले, परीक्षित महाराज ने चंद्रमा-देव के वंश, सोम-वंश को अधिक सम्मान दिया, क्योंकि यादव वंश में, चंद्रमा से उतरते हुए, कृष्ण प्रकट हुए थे। शाही आदेश के दो अलग-अलग क्षत्रिय परिवार हैं, एक चंद्र ग्रह के राजा से उतरता है और दूसरा सूर्य के राजा से उतरता है। जब भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व प्रकट होते हैं, तो वे आम तौर पर एक क्षत्रिय परिवार में प्रकट होते हैं क्योंकि वे धार्मिक सिद्धांतों और धर्म के जीवन को स्थापित करने के लिए आते हैं। वैदिक व्यवस्था के अनुसार, क्षत्रिय परिवार मानव जाति का रक्षक है। जब भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान रामचंद्र के रूप में प्रकट हुए, तो वे सूर्य-वंश में प्रकट हुए, जो सूर्य-देव से उतरने वाले परिवार से संबंधित थे, और जब वे भगवान कृष्ण के रूप में प्रकट हुए, तो उन्होंने यादव वंश या यदु-वंश में ऐसा किया, जिसका वंश था चंद्रमा-देव से। श्रीमद्-भागवतम के नौवें सर्ग के चौबीसवें अध्याय में, यदु-वंश के राजाओं की एक लंबी सूची है। सोम-वंश और सूर्य-वंश दोनों के सभी राजा महान और शक्तिशाली थे, और महाराज परीक्षित ने उनकी बहुत प्रशंसा की (राज्ञां चोभय-वंश्यानां चरितं परमाद्भुतम)। फिर भी, वह सोम-वंश के बारे में और अधिक सुनना चाहते थे क्योंकि यही वह वंश था जिसमें कृष्ण प्रकट हुए थे।

भगवान कृष्ण के सर्वोच्च निवास, को ब्रह्म-संहिता में चिंतामणि के निवास के रूप में वर्णित किया गया है: चिंतामणि-प्रकर-सदमसु कल्प-वृक्ष-लक्षावृतेषु सुभिंर अभिपालयन्तम. इस पृथ्वी पर वृंदावन-धाम उसी निवास की एक प्रतिकृति है। जैसा कि भगवद्-गीता (8.20) में कहा गया है, आध्यात्मिक आकाश में एक और, शाश्वत प्रकृति है, जो प्रकट और अप्रकट पदार्थ के लिए पारलौकिक है। प्रकट दुनिया को सूर्य और चंद्रमा जैसे कई तारों और ग्रहों के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसके परे अप्रकट है, जो सन्निहित लोगों के लिए अगोचर है। और इस अघोषित पदार्थ से परे आध्यात्मिक राज्य है, जिसे भगवद्-गीता में सर्वोच्च और शाश्वत के रूप में वर्णित किया गया है। उस राज्य का कभी नाश नहीं होता। यद्यपि भौतिक प्रकृति बार-बार सृजन और विनाश के अधीन है, लेकिन आध्यात्मिक प्रकृति हमेशा की तरह बनी रहती है। श्रीमद्-भागवतम के दसवें सर्ग में, उस आध्यात्मिक प्रकृति, आध्यात्मिक जगत को वृंदावन, गोलोक वृंदावन या व्रज-धाम के रूप में वर्णित किया गया है। नौवें सर्ग के उपर्युक्त श्लोक का विस्तृत विवरण - जातो गतो पितृ-गृहाद (भाग. 9.24.66) - यहाँ, दसवें सर्ग में मिलेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)