युधिष्ठिर महाराज ने यह अश्वमेध-यज्ञ किया, लेकिन उनका मानना है कि इस तरह के यज्ञ करने से भी किए गए बड़े पापों से मुक्ति नहीं मिल सकती। युद्ध में या तो पति या भाई या यहाँ तक कि पिता या पुत्र लड़ने जाते हैं। और जब वे मारे जाते हैं, तो एक नई शत्रुता पैदा होती है, और इस तरह क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं की एक श्रृंखला बढ़ती जाती है जिसका हजारों अश्वमेध-यज्ञों से भी प्रतिकार करना संभव नहीं है।
कर्म का मार्ग (कर्म) वैसा ही है। यह एक क्रिया और दूसरी प्रतिक्रिया एक साथ पैदा करता है और इस प्रकार भौतिक गतिविधियों की श्रृंखला को बढ़ाता है, जो कर्ता को भौतिक बंधन में बाँधता है। भगवद्-गीता (9.27-28) में उपाय सुझाया गया है कि कार्य के मार्ग की ऐसी क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को तभी रोका जा सकता है जब सर्वोच्च भगवान की ओर से कार्य किया जाए। कुरुक्षेत्र का युद्ध वास्तव में भगवान श्री कृष्ण की इच्छा से लड़ा गया था, जैसा कि उनके संस्करण से स्पष्ट है, और केवल उनकी इच्छा से युधिष्ठिर को हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठाया गया था। इसलिए, वास्तव में पांडवों को कोई भी पाप नहीं छुआ, जो केवल भगवान के आदेश वाहक थे। दूसरों के लिए, जो व्यक्तिगत स्वार्थ से युद्ध की घोषणा करते हैं, पूरी ज़िम्मेदारी उन्हीं पर होती है।
