श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  1.8.49 
बालद्विजसुहृन्मित्रपितृभ्रातृगुरुद्रुह: ।
न मे स्यान्निरयान्मोक्षो ह्यपि वर्षायुतायुतै: ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
मैंने कई बालकों, ब्राह्मणों, हितैषियों, दोस्तों, माता-पिता, शिक्षकों और भाइयों की हत्या कर दी है। लाखों वर्ष जीवित रहूँ तब भी, मैं इन सब पापों के कारण मिलने वाले नरक से कभी भी मुक्त नहीं हो पाऊँगा।
 
I have killed many children, brahmins, well-wishers, friends, uncles, paternal uncles, teachers and brothers. Even if I live for millions of years, I will never be able to escape the hell that I am going to get because of all these sins.
तात्पर्य
जब कभी भी युद्ध होता है, निश्चित रूप से कई मासूम जीवों, जैसे कि लड़के, ब्राह्मण और महिलाएं जिनकी हत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है, का नरसंहार होता है। वे सभी मासूम जीव हैं, और सभी परिस्थितियों में शास्त्रों में उनकी हत्या को निषिद्ध बताया गया है। महाराज युधिष्ठिर इन नरसंहारों से अवगत थे। इसी प्रकार, दोनों पक्षों में मित्र, माता-पिता और गुरु भी थे और ये सभी मारे गए थे। उनके लिए इस तरह की हत्या के बारे में सोचना भयानक था, और इसलिए वह लाखों-करोड़ों वर्षों तक नरक में रहने के बारे में सोच रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)