भगवान के अनेकों पारलौकिक कार्यकलाप हैं और यदि श्रवण क्रिया पूर्ण हो, तो उनमें से प्रत्येक कार्यकलाप मनोवांछित फल देने में समर्थ है। भागवत में भगवान के कार्यकलाप का प्रारंभ पाण्डवों से उनके व्यवहार से होता है। उनके असुरों और अन्य से सबंधित व्यवहारों से संबंधित कई अन्य लीलाएँ भी हैं। दशम स्कंध में गोपियों के साथ उनकी रमणीय लीलाओं के साथ-साथ द्वारका में उनकी पति-पत्नी रूप में विवाहित पत्नियों से संबंधों का वर्णन भी है। भगवान पूर्ण हैं, इसलिए भगवान के प्रत्येक व्यवहार में तथा परमपवित्र सत्ता में किसी प्रकार का अन्तर नहीं है। परंतु कभी-कभी लोग अनधिकृत श्रवण प्रक्रिया द्वारा गोपियों के साथ उनके व्यवहार के बारे में अधिक सुनने में रुचि लेते हैं। ऐसी प्रवृत्ति उनके आसक्ति-भावों का ही द्योतक है। अतः भगवान के व्यवहार का वास्तविक व्याख्याता इस प्रकार की प्रक्रिया को कभी नहीं अपनाता है। भगवान के विषय में हमें श्रीमद् भागवत या किसी अन्य शास्त्र में वर्णित अनुसार प्रारंभ से ही श्रवण कार्य का अवलंब करना चाहिए। इससे श्रवण करने वाले को विकासशील प्रगतिशीलता द्वारा पूर्णता प्राप्त करने में सहायता प्राप्त होती है। इसलिए कभी इस बात का विचार नहीं करना चाहिए कि पाण्डवों के साथ उनका व्यवहार गोपियों के साथ व्यवहार से कम महत्त्वपूर्ण है। हमें यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि भगवान सदा लौकिक आसक्ति से परे हैं। भगवान के उपर्युक्त व्यवहारों में वे प्रत्येक परिस्थिति में नायक हैं और उनका, उनके भक्तों या सेनानियों के विषय में श्रवण का संबंध आध्यात्मिक जीवन से है। ऐसा कहा जाता है कि वेद और पुराण आदि ग्रंथ इसलिए प्रस्तुत किए गए हैं, जिससे भगवान के साथ हमारे जो खोए हुए संबंध हैं उन्हें पुनर्जीवित किया जा सके। इन सभी शास्त्रों का श्रवण करना आवश्यक है।
