हे प्रभु, जिनके पेट पर कमल के फूल जैसा गर्त है, जो हमेशा कमल के फूलों की माला पहनते हैं, जिनकी नजर कमल के फूलों की तरह ठंडी है और जिनके पैरों पर कमल के फूल उकेरे गए हैं, मैं उन्हें सादर नमन करती हूं।
I offer my respectful obeisances unto that Lord, who has a cavity like a lotus flower in the centre of his abdomen, who always wears a garland of lotus flowers, whose glance is as cool as a lotus flower, and whose feet are imprinted with lotus flowers.
तात्पर्य
यहाँ कुछ विशिष्ट प्रतीकात्मक चिह्न हैं जो भगवान के दैहिक शरीर पर हैं जो उनकी देह को दूसरे सभी देहों से अलग करते हैं। ये भगवान के शरीर की सभी विशेषताएँ हैं। भगवान हममें से एक के रूप में प्रकट हो सकते हैं, लेकिन अपने विशिष्ट शारीरिक बनावट से हमेशा अलग होते हैं। श्रीमती कुन्ती खुद को स्त्री होने के कारण प्रभु को देखने के लिए अयोग्य मानती हैं। यह इसलिए कहा जाता है क्योंकि स्त्रियाँ, शूद्र (मजदूर वर्ग) और द्विज-बंधु, या उच्च तीन वर्गों के वंशज, भगवान के आध्यात्मिक नाम, यश, गुणों, रूपों आदि से संबंधित विशिष्ट विषय को समझने के लिए बुद्धिमान नहीं हैं। ऐसे व्यक्ति, यद्यपि वे भगवान के आध्यात्मिक मामलों में प्रवेश करने के लिए अयोग्य हैं, वे उन्हें अर्च-विग्रह के रूप में देख सकते हैं, जो कि ऊपर वर्णित महिलाओं, शूद्रों और द्विज-बंधुओं सहित गिरी हुई आत्माओं को एहसान बाँटने के लिए भौतिक दुनिया में उतरते हैं। क्योंकि ऐसी गिरी हुई आत्माएँ भौतिक पदार्थ से परे कुछ नहीं देख सकती हैं, प्रभु प्रत्येक और सभी असंख्य ब्रह्मांडों में गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में अवतरित होते हैं, जो अपने दैवीय उदर के केंद्र में कमल के समान घनेपन से एक कमल का तना उगाते हैं, और इस प्रकार ब्रह्मा, ब्रह्मांड का पहला जीवित प्राणी पैदा होता है। इसलिए, भगवान को पंकजनाभि के रूप में जाना जाता है। पंकजनाभि भगवान विभिन्न तत्वों में अर्च-विग्रह (उनका दिव्य रूप) को स्वीकार करते हैं, अर्थात् मन के भीतर एक रूप, लकड़ी से बना एक रूप, मिट्टी से बना एक रूप, धातु से बना एक रूप, आभूषण से बना एक रूप, रंग से बना एक रूप, रेत पर खींचा गया रूप, आदि। भगवान के ऐसे सभी रूप हमेशा कमल के फूलों की मालाओं से सजाए जाते हैं, और पूजा के मंदिर में एक सुखदायक वातावरण होना चाहिए ताकि भौतिक कलह में हमेशा लिप्त रहने वाले गैर-भक्तों का ध्यान खींचा जा सके। ध्यान करने वाले दिमाग के भीतर एक रूप की पूजा करते हैं। इसलिए, भगवान महिलाओं, शूद्रों और द्विज-बंधुओं के प्रति भी दयालु हैं, बशर्ते वे उनके लिए बने विभिन्न रूपों में पूजा के मंदिर में जाने के लिए सहमत हों। ऐसे मंदिर आगंतुक मूर्तिपूजक नहीं हैं, जैसा कि कुछ लोगों द्वारा ज्ञान के खराब भंडार के साथ आरोप लगाया जाता है। सभी महान आचार्यों ने सभी स्थानों पर पूजा के ऐसे मंदिरों की स्थापना केवल कम बुद्धिमानों के पक्ष में की, और किसी को भी मंदिर पूजा के चरण को पार करने के रूप में खुद को प्रस्तुत नहीं करना चाहिए, जबकि कोई वास्तव में शूद्रों और महिलाओं की श्रेणी में है। भगवान को उनके चरण कमल से देखना शुरू करना चाहिए, धीरे-धीरे जांघों, कमर, छाती और चेहरे तक बढ़ना चाहिए। भगवान के कमल चरणों को देखने के आदी हुए बिना भगवान के चेहरे को देखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। श्रीमती कुन्ती ने भगवान की मौसी होने के कारण, भगवान को चरण कमल से देखना शुरू नहीं किया क्योंकि भगवान को शर्म आ सकती है, और इस तरह कुन्तीदेवी ने सिर्फ भगवान के लिए एक दर्दनाक स्थिति को बचाने के लिए, भगवान को अपने कमल के चरणों से ऊपर, यानी भगवान की कमर से, धीरे-धीरे चेहरे तक, और फिर कमल के चरणों तक देखना शुरू किया। राउंड में, वहाँ सब कुछ क्रम में है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥