श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.8.19 
मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षजमव्ययम् ।
न लक्ष्यसे मूढद‍ृशा नटो नाट्यधरो यथा ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
सीमित इंद्रिय-ज्ञान से परे होने के कारण, आप सदैव शुद्ध और पूर्ण रहने वाले तत्त्व हैं, जो भ्रामक शक्ति (माया) के पर्दे से ढके हुए हैं। आप मूर्ख दर्शक के लिए उसी तरह अदृश्य रहते हैं, जैसे अभिनेता के वेश में सजा हुआ कलाकार पहचान में नहीं आता है।
 
Being beyond the limited senses, You are the eternal, indestructible Principle, veiled by the deceiving power (maya). You are invisible to the foolish spectator, just as an actor dressed in his costume cannot be recognized.
तात्पर्य
भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने इस बात की पुष्टि की कि कम बुद्धिमान व्यक्ति उन्हें हमारे जैसे साधारण इंसान मानकर गलती करते हैं और इसलिए उनका उपहास करते हैं। रानी कुंती ने भी यही बात यहाँ पुष्टि की है। कम बुद्धिमान व्यक्ति वे हैं जो भगवान के अधिकार के विरुद्ध विद्रोह करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को असुर कहा जाता है। असुर भगवान के अधिकार को नहीं पहचान सकते। जब भगवान स्वयं हमारे बीच, राम, नृसिंह, वराह या कृष्ण के रूप में अपने मूल रूप में प्रकट होते हैं, तो वे कई चमत्कारिक कार्य करते हैं जो मानवीय रूप से असंभव हैं। जैसा कि हम इस महान साहित्य के दसवें खंड में देखेंगे, भगवान श्री कृष्ण ने अपनी माँ की गोद में लेटे हुए बचपन के दिनों से ही अपनी अमानवीय गतिविधियाँ प्रदर्शित कीं। उन्होंने पूतना डायन को मार डाला, हालाँकि उसने भगवान को मारने के लिए अपने स्तन पर जहर लगाया था। भगवान ने एक सामान्य बच्चे की तरह उसके स्तन को चूसा, और उन्होंने उसके प्राण भी चूस लिए। इसी तरह, उन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठा लिया, जैसे एक लड़का एक मेंढक की छतरी उठाता है, और वृंदावन के निवासियों को सुरक्षा देने के लिए लगातार कई दिनों तक ऐसे ही खड़े रहे। ये भगवान की कुछ अलौकिक गतिविधियाँ हैं जो पुराणों, इतिहासों और उपनिषदों जैसे आधिकारिक वैदिक साहित्यों में वर्णित हैं। उन्होंने भगवद्गीता के रूप में अद्भुत निर्देश दिए हैं। उन्होंने एक नायक, एक गृहस्थ, एक शिक्षक और एक त्यागी के रूप में अद्भुत क्षमताएँ दिखाई हैं। उन्हें व्यास, देवल, असित, नारद, माध्व, शंकरा, रामानुज, श्री चैतन्य महाप्रभु, जीव गोस्वामी, विश्वनाथ चक्रवर्ती, भक्तिसिद्धांत सरस्वती और इस पंक्ति के अन्य सभी अधिकारियों जैसे आधिकारिक व्यक्तित्वों द्वारा ईश्वर का परम व्यक्तित्व स्वीकार किया जाता है। उन्होंने स्वयं कई जगह इसका वर्णन किया है। और फिर भी राक्षसी मानसिकता वाले पुरुषों का एक वर्ग है जो हमेशा भगवान को सर्वोच्च सत्य के रूप में स्वीकार करने से हिचकिचाते हैं। यह आंशिक रूप से उनके ज्ञान की कमियों के कारण है और आंशिक रूप से उनकी हठधर्मिता के कारण है, जिसके परिणामस्वरूप अतीत और वर्तमान में विभिन्न कुकर्म हुए हैं। ऐसे व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण को उस समय भी नहीं पहचान सके जब वह उनके सामने उपस्थित थे। एक और कठिनाई यह है कि जो लोग अपनी अपूर्ण इंद्रियों पर अधिक निर्भर करते हैं, वे उन्हें सर्वोच्च भगवान के रूप में महसूस नहीं कर सकते। ऐसे व्यक्ति आधुनिक वैज्ञानिक जैसे हैं। वे अपने प्रायोगिक ज्ञान से सब कुछ जानना चाहते हैं। लेकिन सर्वोच्च व्यक्ति को अपूर्ण प्रायोगिक ज्ञान द्वारा जानना संभव नहीं है। उन्हें यहाँ अधोक्षज या प्रायोगिक ज्ञान की सीमा से परे बताया गया है। हमारी सभी इंद्रियाँ अपूर्ण हैं। हम हर चीज को देखने का दावा करते हैं, लेकिन हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हम केवल कुछ निश्चित भौतिक परिस्थितियों में चीजों का अवलोकन कर सकते हैं, जो हमारे नियंत्रण से भी परे हैं। भगवान इंद्रिय बोध के परे हैं। रानी कुंती सशर्त आत्मा की इस कमी को स्वीकार करती हैं, विशेष रूप से महिला वर्ग, जो कम बुद्धिमान हैं। कम बुद्धिमान पुरुषों के लिए मंदिर, मस्जिद या चर्च जैसी चीजें होनी चाहिए ताकि वे भगवान के अधिकार को पहचानना शुरू कर सकें और ऐसे पवित्र स्थानों में अधिकारियों से उनके बारे में सुन सकें। कम बुद्धिमान पुरुषों के लिए, आध्यात्मिक जीवन की यह शुरुआत आवश्यक है, और केवल मूर्ख व्यक्ति ही ऐसे पूजा स्थलों की स्थापना को बदनाम करते हैं, जो लोगों के लिए आध्यात्मिक विशेषताओं का स्तर ऊपर उठाने के लिए आवश्यक हैं। कम बुद्धिमान व्यक्तियों के लिए, भगवान के अधिकार के सामने झुकना, जैसा कि आमतौर पर मंदिरों, मस्जिदों या चर्चों में किया जाता है, उतना ही लाभकारी है जितना कि उन्नत भक्तों के लिए सक्रिय सेवा द्वारा उन पर ध्यान करना।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)