श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.8.18 
कुन्त्युवाच
नमस्ये पुरुषं त्वाद्यमीश्वरं प्रकृते: परम् ।
अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम् ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
श्रीमती कुन्ती ने कहा: हे कृष्ण, मैं तुम्हें नमन करती हूँ, क्योंकि तुम ही आदि पुरुष हो और इस भौतिक दुनिया के गुणों से अप्रभावित रहते हो। तुम समस्त वस्तुओं के अंदर और बाहर उपस्थित रहते हो, फिर भी सबके लिए अदृश्य हो ।
 
Srimati Kunti said: O Krishna, I offer my obeisances unto You, for You are the original Person and are unattached to the modes of this material world. Though You are situated within and outside all things, You are invisible to all.
तात्पर्य
श्रीमती कुंतीदेवी को अच्छी तरह पता था कि कृष्ण भगवान के असली व्यक्तित्व हैं, भले ही वे उनके भतीजे के रूप में भूमिका निभा रहे थे। ऐसी प्रबुद्ध महिला अपने भतीजे को प्रणाम करके गलती नहीं कर सकती थी। इसलिए, उन्होंने उन्हें भौतिक लोक से परे असली पुरुष के रूप में संबोधित किया। यद्यपि सभी जीवित प्राणी भी पारलौकिक हैं, लेकिन वे न तो असली हैं और न ही अचूक हैं। जीवित प्राणी भौतिक प्रकृति के चंगुल में गिरने के लिए उपयुक्त हैं, लेकिन प्रभु कभी ऐसे नहीं होते हैं। इसलिए, वेदों में, उन्हें सभी जीवित प्राणियों के बीच मुख्य बताया गया है (नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्)। फिर उन्होंने ईश्वर या नियंत्रक के रूप में संबोधित किया जाता है। चंद्र और सूर्य जैसे जीवित प्राणी या देवता भी कुछ हद तक ईश्वर हैं, लेकिन उनमें से कोई भी सर्वोच्च ईश्वर या अंतिम नियंत्रक नहीं है। वह परमेश्वर हैं, या महात्मा हैं। वह अंदर और बाहर दोनों जगह हैं। यद्यपि वे अपने भतीजे के रूप में श्रीमती कुंती के सामने उपस्थित थे, लेकिन वह उनके भीतर और आसपास हर किसी में थे। भगवद-गीता में (15.15) भगवान कहते हैं, "मैं हर किसी के दिल में स्थित हूं, और केवल मेरे कारण ही कोई याद करता है, भूलता है और अवगत होता है, आदि। सभी वेदों के माध्यम से मुझे जाना जाना है क्योंकि मैं वेदों का संकलनकर्ता हूं, और मैं वेदांत का शिक्षक हूं।" रानी कुंती पुष्टि करती हैं कि प्रभु सभी जीवित प्राणियों के भीतर और बाहर होने के बाद भी अदृश्य हैं। प्रभु, आम आदमी के लिए एक पहेली है। रानी कुंती ने व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया कि भगवान कृष्ण उनके सामने उपस्थित थे, फिर भी वह उत्तर के गर्भ में अश्वत्थामा की ब्रह्मास्त्र के हमले से उसके भ्रूण को बचाने के लिए दाखिल हुए। कुंती खुद इस बात से हैरान थी कि श्रीकृष्ण सर्वव्यापी हैं या स्थानीयकृत हैं। वास्तव में, वह दोनों हैं, लेकिन वह उन लोगों के सामने नहीं आने का अधिकार रखते हैं जो आत्मसमर्पित आत्माएं नहीं हैं। इस जांच के पर्दे को सर्वोच्च भगवान की माया ऊर्जा कहा जाता है, और यह विद्रोही आत्मा की सीमित दृष्टि को नियंत्रित करता है। इसे निम्नानुसार समझाया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)