अनर्थोपशमं साक्षाद्भक्तियोगमधोक्षजे ।
लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वतसंहिताम् ॥ ६ ॥
अनुवाद
जीवन में होने वाले भौतिक कष्टों, जिन्हें वे अनर्थ समझते हैं, भक्ति सेवा में लग जाने से प्रत्यक्ष रूप से कम किए जा सकते हैं। लेकिन अधिकतर लोग यह नहीं जानते हैं; इसलिए विद्वान व्यासदेव ने इस वैदिक साहित्य का संकलन किया है, जिसका संबंध परम सत्य से है।
The material sufferings of a living being, which he considers to be misfortune, can be directly reduced by Bhakti Yoga. But most people do not know this; therefore, the learned Vyasadeva has compiled this Vedic literature, which is related to the Absolute Truth.
तात्पर्य
श्रील व्यासदेव ने ईश्वर के पूर्ण व्यक्तित्व को देखा। यह कथन इस बात को इंगित करता है कि ईश्वर के पूर्ण व्यक्तित्व इकाई में उनके अंश और उनके द्वारा निर्मित जीव भी शामिल हैं। उन्होंने इसलिए उनकी विभिन्न शक्तियों को देखा, अर्थात् आंतरिक शक्ति, सशर्त शक्ति और बाह्य शक्ति। उन्होंने उनके विभिन्न पूर्णांश और पूर्णांशों के अंश, अर्थात् उनके विभिन्न अवतारों को भी देखा, और विशेष रूप से सशर्त आत्माओं के अवांछित कष्टों को देखा, जो बाह्य शक्ति से भ्रमित हैं। और अंत में उन्होंने सशर्त आत्माओं के लिए निदान देखा, अर्थात् भक्ति सेवा की प्रक्रिया। यह एक महान अलौकिक विज्ञान है और परमेश्वर के नाम, कीर्ति, गौरव आदि को सुनने और जपने की प्रक्रिया से शुरू होता है। ईश्वर के प्रति निष्क्रिय स्नेह या प्रेम का पुनरुद्धार सुनने और जपने की यांत्रिक प्रणाली पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि यह पूरी तरह से और केवल भगवान की निःस्वार्थ दया पर निर्भर करता है। जब भगवान भक्त के निःस्वार्थ प्रयासों से पूरी तरह से संतुष्ट होते हैं, तो वे उसे अपनी प्रेममयी अलौकिक सेवा से विभूषित कर सकते हैं। लेकिन सुनने और जपने के निर्धारित रूपों के साथ भी, भौतिक अस्तित्व के अतिरिक्त और अवांछित कष्टों का तुरंत अंत हो जाता है। भौतिक मोह का ऐसा अंत अलौकिक ज्ञान के विकास की प्रतीक्षा नहीं करता है। इसके बजाय, परम सत्य के अंतिम बोध के लिए ज्ञान भक्ति सेवा पर निर्भर है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥