भ्रम ऊर्जा की स्व-व्यक्तिगत देखभाल का उल्लेख ऋग्वेद (केन उपनिषद) में देवताओं की नियंत्रित शक्ति संबंधित बताई गई है। यहाँ पर यह भी स्पष्ट बताया गया है कि इन जीवों को बाहरी ऊर्जा व्यक्तिगत तौर पर नियंत्रण करती है। इस तरह बाहरी ऊर्जा के नियंत्रण वाले जीव अलग-अलग स्तिथियों में होते है। हालाँकि, भगवतम के इस कथन से यह स्पष्ट है कि बाहरी ऊर्जा व्यक्तित्व के ईश्वर या पूर्ण प्राणी के सामने भी कमतर स्थिति में ही रहती है। पूर्ण प्राणी या भगवान को मायावी ऊर्जा भी नहीं छू पाती, क्योंकि यह केवल जीवों पर ही काम कर सकती है। इसलिए, यह मात्र कल्पना ही है कि परमेश्वर को भ्रम ऊर्जा विचलित कर सकती है और वह जीव रूप बन जाता है। यदि जीव और भगवान एक ही श्रेणी में होते, तब व्यासदेव उन्हें देख सकते थे, और भ्रमित प्राणी को भौतिक तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ता, क्योंकि परम सत्ता तो सभी को जानती है। अतः, एकेश्वरवादियों द्वारा असंख्य बेईमानी भरी कल्पनाएँ कर भगवन और जीव को एक ही श्रेणी में रखने का प्रयास किया जाता है। यदि भगवान और जीव एक ही होते, तब श्रील शुकादेव गोस्वामी भगवान के दिव्य लीलाओं का वर्णन करने की जहमत क्यों उठाते, क्योंकि वह मायावी ऊर्जा का ही प्रदर्शन होता। श्रीमद भागवतम माया के चंगुल में फंसी पीड़ित मानवता के लिए सर्वोत्तम उपाय है। इसलिए, श्रील व्यासदेव ने सबसे पहले बद्ध आत्माओं की असली बीमारी की पहचान की, यानी बाहरी ऊर्जा के द्वारा उनका भ्रम में होना। उन्होंने पूर्ण परम सत्ता को भी देखा, जिनसे भ्रम ऊर्जा बहुत दूर है, हालाँकि उन्होंने बद्ध आत्माओं और बीमारी के कारण दोनों को ही देखा था। और इलाज के उपायों को अगले श्लोक में सुझाया गया है। निश्चित रूप से परम पुरुष और जीव गुणात्मक रूप से एक हैं, लेकिन भगवान भ्रम ऊर्जा के नियंत्रक हैं, जबकि जीव को भ्रम ऊर्जा द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इस प्रकार भगवान और जीव एक साथ एक और भिन्न हो सकते हैं। यहाँ पर एक और विशिष्ट बिन्दु है: भगवान और जीव के बीच के शाश्वत संबंध अलौकिक है, अन्यथा भगवान माया के चंगुल से बद्ध आत्माओं को मुक्त कराने की जहमत क्यों उठाते। इसी प्रकार, जीव को भी भगवान के लिए अपने प्राकृतिक प्रेम और स्नेह को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता होती है, और यही जीव की सर्वोच्च पूर्णता है। श्रीमद भागवतम बद्ध आत्माओं के साथ जीवन के उद्देश्य को लेकर व्यवहार करता है।
