अर्जुन ने अश्वत्थामा को इस पूरी तरह से जानते हुए गिरफ़्तार किया था कि वह द्रोणाचार्य का बेटा है। कृष्ण भी उसे अच्छी तरह से जानते थे, लेकिन वे दोनों ही उसकी ब्राह्मण पुत्र होने की परवाह किए बिना उसकी हत्या की निंदा करते थे। प्रकट शास्त्रों के अनुसार, अगर कोई शिक्षक या आध्यात्मिक गुरु गुरु या आध्यात्मिक गुरु के पद के लायक नहीं हैं, तो उन्हें त्याग दिया जाना चाहिए। एक गुरु को आचार्य भी कहा जाता है, या वह व्यक्ति जिसने व्यक्तिगत रूप से शास्त्रों के सभी सार को आत्मसात किया हो और अपने शिष्यों को मार्ग अपनाने में मदद की हो। अश्वत्थामा एक ब्राह्मण या शिक्षक के कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहा, इसलिए उसे एक ब्राह्मण के महान पद से त्याग दिए जाने के योग्य था। इस दृष्टिकोण से, भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन दोनों ही अश्वत्थामा की निंदा करने में सही थे। लेकिन द्रौपदी जैसी एक अच्छी महिला के लिए, इस मामले को शास्त्रीय दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि प्रथा के मामले के रूप में देखा जाता था। प्रथा के अनुसार, अश्वत्थामा को वही सम्मान दिया जाता था जो उसके पिता को दिया जाता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि आमतौर पर लोग भावना के नेव पर ही किसी ब्राह्मण के बेटे को सच्चा ब्राह्मण मान लेते हैं। वास्तव में मामला अलग है। किसी ब्राह्मण को उसकी योग्यता के आधार पर स्वीकार किया जाता है, न कि केवल किसी ब्राह्मण का बेटा होने के आधार पर।
लेकिन इन सब के बावजूद, द्रौपदी ने यह चाहा कि अश्वत्थामा को एक बार में ही रिहा कर दिया जाए, और यह उसके लिए एक अच्छी भावना थी। इसका मतलब यह है कि भगवान का भक्त व्यक्तिगत रूप से सभी प्रकार के कष्टों को सहन कर सकता है, लेकिन फिर भी ऐसे भक्त कभी भी दूसरों के प्रति निर्दयी नहीं होते, यहाँ तक कि दुश्मन के साथ भी नहीं। ये उसके लक्षण होते हैं जो भगवान का प्रिय भक्त होता है।
