श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.7.41 
अथोपेत्य स्वशिबिरं गोविन्दप्रियसारथि: ।
न्यवेदयत्तं प्रियायै शोचन्त्या आत्मजान् हतान् ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
अपने प्रिय मित्र एवं सारथी (श्रीकृष्ण) के साथ अपने शिविर में पहुँचकर, अर्जुन ने उस हत्यारे को अपनी पत्नी को सौंप दिया, जो अपने मारे गए पुत्रों के लिए रो रही थी।
 
Reaching his camp along with his dear friend and charioteer (Sri Krishna), Arjun handed over the murderer to his beloved wife, who was mourning for her murdered sons.
तात्पर्य
कृष्ण के साथ अर्जुन का पारलौकिक संबंध घनिष्ठ मित्रता का है। भगवद-गीता में स्वयं भगवान ने अर्जुन को अपना परम मित्र माना है। प्रत्येक जीवित प्राणी इस प्रकार सर्वोच्च भगवान से किसी न किसी प्रकार के स्नेहपूर्ण संबंध से संबंधित है, या तो नौकर के रूप में या मित्र के रूप में या माता-पिता के रूप में या वैवाहिक प्रेम की वस्तु के रूप में। इस प्रकार हर कोई आध्यात्मिक क्षेत्र में भगवान की संगति का आनंद ले सकता है यदि वह चाहे और भक्ति-योग की प्रक्रिया द्वारा ईमानदारी से इसके लिए प्रयास करे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)