श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.7.4 
भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले ।
अपश्यत्पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयम् ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार वह अपना मन पूरी तरह से भक्ति भावना के साथ जोड़कर पूर्ण रूप से भक्ति सेवा में लगाते हैं, जिसमें भौतिकवाद की कोई लेशमात्र भी नहीं होती है। इस तरह वह भगवान श्री कृष्ण के साथ उनकी बहिरंगा शक्ति के साथ भी दर्शन करते हैं जो उनके पूर्ण नियंत्रण में रहती है।
 
Thus he completely concentrated his mind by binding it to devotional service (bhaktiyoga) without any involvement in material things. Thus he saw the Supreme Lord with His external energy, completely under His control.
तात्पर्य
सत्य का उत्तम साक्षात्कार केवल भक्तिमय सेवा की जोड़ पाने की प्रक्रिया से ही संभव है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में भी की गई है। परमेश्वर की सत्ता के रूप में परम सत्य का प्रत्यक्षीकरण पूरी तरह से भक्तियोग की प्रक्रिया द्वारा ही किया जा सकता है और ऐसे परिपूर्ण ज्ञान द्वारा ही भगवान के राज्य में प्रवेश पाया जा सकता है। निर्वैयक्तिक ब्रह्म या स्थानीय रूप परमात्मा के आंशिक दृष्टिकोण द्वारा परम सत्य का अपूर्ण साक्षात्कार किसी को भी भगवान के राज्य में प्रवेश की अनुमति नहीं देता है। श्री नारद ने श्रील व्यासदेव को परमेश्वर की सत्ता और उनकी लीलाओं पर परात्पारीय ध्यान में तल्लीन होने की सलाह दी थी। श्रील व्यासदेव ने ब्रह्म की दिव्य ज्योति पर कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह पूर्ण दृष्टि नहीं है। पूर्ण दृष्टि परमेश्वर की सत्ता है, जैसा कि भगवद्गीता (7.19) में निश्चित किया गया है: वासुदेवः सर्वमिति। उपनिषदों में भी यह पुष्टि की गई है कि वासुदेव, परमेश्वर की सत्ता, निवैयक्तिक ब्रह्म के सुनहरे चमकदार हिरण्मयेन पात्रेण आवरण द्वारा ढकी हुई है, और जब उस आवरण को भगवान की कृपा से हटा दिया जाता है तो परम सत्य का वास्तविक चेहरा दिखाई देता है। परम सत्य का उल्लेख यहाँ पुरुष या व्यक्ति के रूप में किया गया है। वेदों के अनेक साहित्यों में परमेश्वर की सत्ता का उल्लेख किया गया है, और भगवद्गीता में पुरुष को शाश्वत और मूल व्यक्ति के रूप में निश्चित किया गया है। परमेश्वर की सत्ता पूर्ण व्यक्ति है। सर्वोच्च व्यक्ति में अनेक प्रकार की ऊर्जाएँ हैं, जिनमें से आंतरिक, बाह्य और सीमांत ऊर्जाएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। यहाँ जिस ऊर्जा का उल्लेख किया गया है वह बाह्य ऊर्जा है, जैसा कि उसकी गतिविधियों के कथनों से स्पष्ट होगा। आंतरिक ऊर्जा वहाँ परम व्यक्ति के साथ है जैसे चाँदनी चंद्रमा के साथ होती है। बाह्य ऊर्जा की तुलना अंधकार से की जाती है क्योंकि यह जीवित प्राणियों को अज्ञान के अंधेरे में रखती है। अपाश्रयम शब्द बताता है कि प्रभु की यह ऊर्जा पूर्ण नियंत्रण में है। आंतरिक शक्ति या श्रेष्ठ ऊर्जा को माया भी कहा जाता है, पर यह आध्यात्मिक माया है, या पूर्ण क्षेत्र में प्रदर्शित ऊर्जा है। जब कोई इस आंतरिक शक्ति की शरण में होता है, तो भौतिक अज्ञान का अंधकार तुरंत नष्ट हो जाता है। और यहाँ तक कि जो लोग आत्मराम हैं, या तल्लीनता में स्थिर हैं, वे भी इस माया या आंतरिक ऊर्जा की शरण लेते हैं। भक्ति सेवा, या भक्ति योग, आंतरिक ऊर्जा का कार्य है; इस प्रकार निम्न ऊर्जा या भौतिक ऊर्जा के लिए कोई जगह नहीं है, जैसे कि आध्यात्मिक प्रकाश की तेजस्विता में अंधेरे के लिए कोई जगह नहीं है। ऐसी आंतरिक ऊर्जा निवैयक्तिक ब्रह्म की अवधारणा में प्राप्य आध्यात्मिक आनंद से भी श्रेष्ठ है। भगवद्गीता में कहा गया है कि निवैयक्तिक ब्रह्म की तेजस्विता भी परमेश्वर की सत्ता, श्री कृष्ण से ही निकलने वाला उत्सर्जन है। परम पुरुष श्री कृष्ण के सिवाय कोई और नहीं हो सकता है, जैसा कि बाद के श्लोकों में बताया जाएगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)