श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.7.35 
मैनं पार्थार्हसि त्रातुं ब्रह्मबन्धुमिमं जहि ।
योऽसावनागस: सुप्तानवधीन्निशि बालकान् ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री कृष्ण ने कहा: हे अर्जुन, इस ब्राह्मण के रिश्तेदार को छोड़कर दया मत दिखाओ, क्योंकि उसने सोते हुए निर्दोष बालकों की हत्या की है।
 
Lord Krishna said: O Arjun, do not show mercy to this brother of Brahma because he has killed innocent children while they were sleeping.
तात्पर्य
ब्रह्म-बंधु शब्द महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति जो किसी ब्राह्मण के परिवार में जन्म लेता है लेकिन वो ब्राह्मण कहलाने के लायक नहीं होता उसे ब्राह्मण का रिश्तेदार कहा जाता है, न कि ब्राह्मण। हाई कोर्ट जज का बेटा व्यक्तिगत तौर पर हाई कोर्ट जज नहीं होता, लेकिन हाई कोर्ट जज के बेटे को माननीय जज का रिश्तेदार कहने में कोई बुराई नहीं है। इसलिए, जिस तरह केवल जन्म से कोई हाई कोर्ट जज नहीं बन जाता है, उसी तरह कोई भी केवल जन्मसिद्ध अधिकार से ब्राह्मण नहीं बन जाता है बल्कि ब्राह्मण के आवश्यक गुणों को प्राप्त करके बनता है। जिस तरह हाई कोर्ट की जजशिप एक योग्य व्यक्ति के लिए एक पद होती है, उसी तरह ब्राह्मण का पद भी केवल योग्यता से ही प्राप्त हो सकता है। शास्त्र यह भी कहते हैं कि यदि ब्राह्मण के परिवार के अलावा किसी अन्य परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति में अच्छे गुण दिखाई देते हैं, तो योग्य व्यक्ति को ब्राह्मण के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, और इसी तरह यदि ब्राह्मण के परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति ब्राह्मण के गुणों से रहित है, तो उसे गैर-ब्राह्मण के रूप में या बेहतर शब्दों में, ब्राह्मण के रिश्तेदार के रूप में माना जाना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण, सभी धार्मिक सिद्धांतों, वेदों के सर्वोच्च अधिकार ने व्यक्तिगत रूप से इन अंतरों की ओर इशारा किया है, और वह निम्नलिखित श्लोकों में इसका कारण समझाने जा रहे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)