श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 7: द्रोण-पुत्र को दण्ड  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.7.30 
संहत्यान्योन्यमुभयोस्तेजसी शरसंवृते ।
आवृत्य रोदसी खं च ववृधातेऽर्कवह्निवत् ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
जब दो ब्रह्मास्त्रों की किरणें मिल गईं, तब एक वृहद अग्नि चक्र, जो सूर्य के गोले के समान था, ने सम्पूर्ण अंतरिक्ष और ग्रहों के पूरे आकाशमंडल को घेर लिया।
 
When the rays of both the Brahmastras combined, a huge circle of fire, like a ball of the sun, covered the entire outer space and the whole sky of the worlds.
तात्पर्य
ब्रह्मास्त्र की चमक से उत्पन्न तप उस आग के समान हो जाता है जो ब्रह्मांड के विनाश के समय सूर्य मंडल में प्रकट होती है। ब्रह्मास्त्र से उत्पन्न तप की तुलना में परमाणु ऊर्जा विकिरण बहुत ही तुच्छ है। परमाणु बम से अधिकतम एक गोले को ही उड़ाया जा सकता है, लेकिन ब्रह्मास्त्र से उत्पन्न गर्मी पूरी ब्रह्मांड की स्थिति को नष्ट कर सकती है। इसलिए इसकी तुलना ब्रह्मांड के विनाश के समय उत्पन्न गर्मी से की जाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)