विचार यह है कि आम तौर पर मुक्त आत्माएं एकात्मवादी दृष्टिकोण के साथ निराकार ब्रह्म की विशेषता से जुड़ी होती हैं जिसके तहत वे परम पूर्ण एकता प्राप्त करना चाहती हैं। लेकिन व्यासदेव जैसे शुद्ध भक्तों के सानिध्य से, मुक्त आत्माएं भी भगवान के दिव्य गुणों के प्रति आकर्षित हो जाती हैं। श्री नारद की कृपा से, श्रील व्यासदेव श्रीमद-भागवतम के महान महाकाव्य का वर्णन करने में सक्षम हुए, और व्यासदेव की कृपा से, श्रील शुकदेव गोस्वामी इसके सार को समझ पाए। भगवान के दिव्य गुण इतने आकर्षक हैं कि श्रील शुकदेव गोस्वामी निराकार ब्रह्म में पूर्णत: लीन होने से विरत हो गए और उन्होंने भगवान की व्यक्तिगत गतिविधियों को सकारात्मक रूप से ग्रहण कर लिया।
व्यावहारिक रूप से उन्हें निरपेक्षता की निराकार अवधारणा से निकाल दिया गया, स्वयं यह सोचते हुए कि उन्होंने परम के निराकार स्वरूप के प्रति समर्पित करके अपना बहुत समय बर्बाद कर दिया है, या दूसरे शब्दों में, उन्होंने निराकार की तुलना में व्यक्तिगत स्वरूप के साथ अधिक दिव्य आनंद का अनुभव किया। और उस समय से, न केवल वे स्वयं विष्णु-जन, या भगवान के भक्तों के बहुत प्रिय हो गए, बल्कि विष्णु-जन भी उन्हें बहुत प्रिय हो गए। भगवान के भक्त, जो जीवों के व्यक्तित्व को मारना नहीं चाहते हैं और भगवान के व्यक्तिगत सेवक बनना चाहते हैं, वे निराकारवादियों को बहुत अधिक पसंद नहीं करते हैं, और इसी तरह से निराकारवादी, जो परम के साथ एक होना चाहते हैं, भगवान के भक्तों का मूल्यांकन करने में असमर्थ हैं। इस प्रकार, अनादि काल से ये दो दिव्य तीर्थयात्री कभी-कभी प्रतिस्पर्धी रहे हैं। दूसरे शब्दों में, व्यक्तिगत और निराकार साक्षात्कार के कारण उनमें से प्रत्येक दूसरे से अलग रहना पसंद करता है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि श्रील शुकदेव गोस्वामी को भी भक्तों के प्रति कोई लगाव नहीं था। लेकिन चूंकि वे स्वयं एक संतृप्त भक्त बन गए थे, इसलिए वे हमेशा विष्णु-जनों के दिव्य संग की कामना करते थे, और विष्णु-जन भी उनके संग को पसंद करते थे, क्योंकि वे एक व्यक्तिगत भागवत बन गए थे। इस प्रकार, पुत्र और पिता दोनों ही ब्रह्म में दिव्य ज्ञान से पूर्णत: अवगत थे, और बाद में दोनों ही परम भगवान के व्यक्तिगत स्वरूपों में लीन हो गए। भागवतम् के कथन से शुकदेव गोस्वामी कैसे आकर्षित हुए, इस प्रश्न का उत्तर इस श्लोक द्वारा पूर्णत: दिया गया है।
