जहाँ तक दुर्जनों का संबंध है, उनकी संख्या भी चार है: (1) वे जो केवल प्रगतिशील फलदायी कार्य के तरीके के आदी हैं और इस तरह साथ में आने वाले कष्टों के अधीन हैं, (2) वे जो केवल कामुक संतुष्टि के लिए शातिपूर्ण काम के आदी हैं और इसलिए परिणाम भुगतते हैं, (3) जो भौतिक रूप से ज्ञान में बहुत उन्नत हैं, लेकिन जो पीड़ित हैं क्योंकि उनके पास सर्वशक्तिमान भगवान के अधिकार को स्वीकार करने की भावना नहीं है, और (४) पुरुषों की श्रेणी जिन्हें नास्तिक के रूप में जाना जाता है और इसलिए वे भगवान के नाम से ही जानबूझ कर नफरत करते हैं, हालाँकि वे हमेशा कठिनाई में रहते हैं।
श्री नारदजी ने सच्चरित्र और दुष्ट दोनों वर्गों के आठों वर्गों के पुरुषों का भला करने के लिए व्यासदेव को भगवान के गौरवों का वर्णन करने की सलाह दी। इसलिए श्रीमद-भागवत किसी विशेष वर्ग के लोगों या संप्रदाय के लिए नहीं है। यह उस सच्चे आत्मा के लिए है जो वास्तव में अपना कल्याण और मन की शांति चाहता है।
