जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत्सनातनम् ।
तथापि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४ ॥
अनुवाद
तुमने निराकार ब्रह्म से संबंधित विषय और उससे प्राप्त होने वाले ज्ञान को अच्छी तरह से लिखा है, तो इतना सब होने के बावजूद, हे मेरे स्वामी, अपने आपको व्यर्थ मानकर हताश होने की क्या बात है?
You have very well documented the knowledge of the formless Brahman and that which is gained from it. So, after all this, O my Lord, why should you feel dejected and feel useless?
तात्पर्य
वेदांत-सूत्र या ब्रह्म-सूत्र की रचना श्री व्यासदेव ने की है और यह अवैयक्तिक परम तत्व का पूर्ण विवेचन है। इसे संसार में सबसे श्रेष्ठ दार्शनिक व्याख्या के रूप में स्वीकार किया जाता है। यह शाश्वतता के विषय को समाहित करता है और इसकी विधियाँ विद्वतापूर्ण हैं। इसलिए व्यासदेव की पारलौकिक विद्वता के बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता। तो वह विलाप क्यों करें?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥