हे ब्राह्मण, सर्वप्रथम भगवान् श्री कृष्ण ने मुझे वेदों के सबसे गुह्यतम भागों में निहित भगवान् के दिव्य ज्ञान से युक्त किया, फिर आध्यात्मिक ऐश्वर्य प्रदान किया और उसके बाद अपनी अंतरंग प्रेममयी सेवा का वरदान दिया।
O brahmana, thus Lord Krishna first blessed me with the transcendental knowledge of the Lord contained in the secret portions of the Vedas, then with spiritual opulence, and then with His intimate loving service.
तात्पर्य
प्रभु से संवाद, जो दिव्य ध्वनि के प्रसारण से होता है, सम्पूर्ण आध्यात्मिक प्रभु श्री कृष्ण से भिन्न नहीं है। प्रभु तक पहुँचने के लिए यह एक पूर्ण विधि है। प्रभु से ऐसे शुद्ध संपर्क से, भौतिक धारणाओं (दस) के अपराध के बिना, भक्त वैदिक साहित्य के आंतरिक अर्थ को समझने के लिए, जिसमें दिव्य क्षेत्र में प्रभु का अस्तित्व शामिल है, भौतिक स्तर से ऊपर उठ सकता है। प्रभु अपनी पहचान धीरे-धीरे उस व्यक्ति पर प्रकट करता है जिसकी आध्यात्मिक गुरु और प्रभु दोनों में दृढ़ आस्था है। इसके बाद, भक्त रहस्यमयी ऐश्वर्य से संपन्न होता है, जो संख्या में आठ होते हैं। और सबसे बढ़कर, भक्त को प्रभु के गोपनीय दल में स्वीकार किया जाता है और आध्यात्मिक गुरु की एजेंसी के माध्यम से प्रभु की विशिष्ट सेवा सौंपी जाती है। एक शुद्ध भक्त भगवान की सेवा करने में अधिक रुचि रखता है, न कि उसमें सुप्त रहस्यमय शक्तियों का प्रदर्शन करने में। श्री नारद ने ये सब अपने व्यक्तिगत अनुभव से समझाया है, और कोई भी वे सभी सुविधाएँ प्राप्त कर सकता है जो श्री नारद ने प्रभु के ध्वनि प्रतिनिधित्व के जप की प्रक्रिया को पूर्ण करके प्राप्त की थीं। इस दिव्य ध्वनि का जाप करने के लिए किसी के लिए भी कोई रोक नहीं है, बशर्ते यह नारद के प्रतिनिधि के माध्यम से प्राप्त किया गया हो, जो अनुशासित उत्तराधिकार की श्रृंखला, या परंपरा प्रणाली द्वारा नीचे आ रहा हो।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥