हमारी आय का अधिकांश भाग, कम से कम पचास प्रतिशत, भगवान कृष्ण के आदेश का पालन करने में लगाना चाहिए। न केवल हमें अपनी कमाई का लाभ इस कारण को देना चाहिए, बल्कि हमें इस भक्ति की साधना को दूसरों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी करनी चाहिए क्योंकि वह भी भगवान के आदेशों में से एक है। भगवान निश्चित रूप से कहते हैं कि कोई भी उनसे अधिक प्रिय नहीं है जो हमेशा दुनिया भर में भगवान के नाम और प्रसिद्धि के प्रचार कार्य में लगे रहते हैं। भौतिक दुनिया की वैज्ञानिक खोजों को भी उसी तरह उनके आदेश को पूरा करने में लगाया जा सकता है। वह चाहते हैं कि भगवद-गीता का संदेश उनके भक्तों के बीच प्रचारित किया जाए। यह उन लोगों के बीच नहीं किया जा सकता जिनके पास तपस्या, दान, शिक्षा आदि का कोई श्रेय नहीं है। इसलिए, अनिच्छुक पुरुषों को उनका भक्त बनाने के लिए प्रयास जारी रहा। भगवान चैतन्य ने इस संबंध में एक बहुत ही सरल तरीका सिखाया है। उन्होंने गायन, नृत्य और जलपान के माध्यम से पारलौकिक संदेश का प्रचार करने का पाठ पढ़ाया है। ऐसे में हमारी आय का पचास प्रतिशत इस उद्देश्य के लिए खर्च किया जा सकता है। कलह और विवाद के इस पतित युग में, यदि केवल समाज के अग्रणी और धनी व्यक्ति अपनी आय का पचास प्रतिशत भगवान की सेवा में खर्च करने के लिए सहमत हों, जैसा कि भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने सिखाया है, तो निश्चित रूप से इस पांडेमोनियम के नर्क को बदलने की निश्चितता है। भगवान का पारलौकिक निवास। अच्छे गायन, नृत्य और जलपान का प्रबंध हो तो कोई भी समारोह में शामिल होने से मना नहीं करेगा। इस तरह के समारोह में हर कोई शामिल होगा और भगवान की दिव्य उपस्थिति को व्यक्तिगत रूप से महसूस करना निश्चित है। अकेले यह ही उपस्थित लोगों को भगवान के साथ जुड़ने और इस तरह आध्यात्मिक अनुभूति में खुद को शुद्ध करने में मदद करेगा। ऐसी आध्यात्मिक गतिविधियों को सफलतापूर्वक निष्पादित करने की एकमात्र शर्त यह है कि उनका संचालन एक शुद्ध भक्त के मार्गदर्शन में होना चाहिए जो सभी सांसारिक इच्छाओं, फलदायक गतिविधियों और भगवान के स्वरूप के बारे में शुष्क अटकलों से पूरी तरह मुक्त है। किसी को भी प्रभु की प्रकृति का पता नहीं लगाना है। यह स्वयं भगवान द्वारा विशेष रूप से भगवद गीता में और सामान्य रूप से अन्य सभी वैदिक साहित्यों में पहले ही कहा जा चुका है। हमें बस उन्हें समग्र रूप से स्वीकार करना है और प्रभु के आदेशों का पालन करना है। यह हमें पूर्णता के मार्ग पर ले जाएगा। मनुष्य अपनी स्थिति में बना रह सकता है। किसी को भी अपनी स्थिति बदलने की जरूरत नहीं है, खासकर यह विभिन्न कठिनाइयों के युग में। एकमात्र शर्त यह है कि भगवान के साथ एकरूप होने के उद्देश्य से शुष्क अटकल की आदत छोड़ देनी चाहिए। और इस तरह की ऊँची उड़ी हुई वन्दनाओं को छोड़ने के बाद, व्यक्ति ऊपर बताई गई योग्यता वाले एक वास्तविक भक्त के मुंह से भगवद-गीता या भागवतम में भगवान के आदेशों को बहुत नम्रतापूर्वक प्राप्त कर सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सब कुछ सफल होगा।
