श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.5.36 
कुर्वाणा यत्र कर्माणि भगवच्छिक्षयासकृत् ।
गृणन्ति गुणनामानि कृष्णस्यानुस्मरन्ति च ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञाओं का पालन करते हुए व्यक्ति निरन्तर उन्हें, उनके नामों और उनके गुणों का स्मरण करता है।
 
While performing actions as per the instructions of the Supreme Personality of Godhead, Sri Krishna, man constantly remembers His name and His qualities.
तात्पर्य
भगवान के एक विशेष भक्त अपने जीवन को इस तरह से ढाल सकते हैं कि इस जीवन या अगले जीवन के लिए किसी भी प्रकार के कर्तव्यों का पालन करते हुए, वे भगवान के नाम, प्रसिद्धि, गुण आदि को लगातार याद रख सकते हैं। भगवद-गीता में भगवान का आदेश स्पष्ट रूप से है: व्यक्ति को जीवन के सभी क्षेत्रों में केवल भगवान के लिए काम करना चाहिए। जीवन के हर क्षेत्र में भगवान मालिक के रूप में स्थित होना चाहिए। वैदिक संस्कारों के अनुसार, इंद्र, ब्रह्मा, सरस्वती और गणेश जैसे कुछ देवताओं की पूजा में भी, प्रणाली यह है कि सभी परिस्थितियों में विष्णु का प्रतिनिधित्व यज्ञेश्वर के रूप में या ऐसे बलिदानों की नियंत्रित करने वाली शक्ति के रूप में होना चाहिए। यह अनुशंसा की जाती है कि किसी विशेष उद्देश्य के लिए किसी विशेष देवता की पूजा की जाए, लेकिन फ़िर भी विष्णु की उपस्थिति समारोह को उचित बनाने के लिए अनिवार्य है। ऐसे वैदिक कर्तव्यों के अलावा, हमारे सामान्य व्यवहारों में भी (उदाहरण के लिए, हमारे घरेलू मामलों में या हमारे व्यवसाय या पेशे में) हमें यह विचार करना चाहिए कि सभी गतिविधियों का परिणाम सर्वोच्च उपभोक्ता, भगवान कृष्ण को दिया जाना चाहिए। भगवद-गीता में भगवान ने स्वयं को हर चीज़ के सर्वोच्च उपभोक्ता, हर ग्रह के सर्वोच्च स्वामी और सभी प्राणियों के सर्वोच्च मित्र होने की घोषणा की है। भगवान श्री कृष्ण के अलावा कोई और अपनी सृष्टि के भीतर सब कुछ का स्वामी होने का दावा नहीं कर सकता। एक शुद्ध भक्त इसे लगातार याद रखता है और ऐसा करने में, वह भगवान के अलौकिक नाम, प्रसिद्धि और गुणों को दोहराता है, जिसका अर्थ है कि वह लगातार भगवान के संपर्क में रहता है। भगवान अपने नाम, प्रसिद्धि आदि के साथ अभिन्न हैं, और इसलिए उनके नाम, प्रसिद्धि आदि के साथ लगातार जुड़े रहने का अर्थ है वास्तव में भगवान के साथ जुड़ना।

हमारी आय का अधिकांश भाग, कम से कम पचास प्रतिशत, भगवान कृष्ण के आदेश का पालन करने में लगाना चाहिए। न केवल हमें अपनी कमाई का लाभ इस कारण को देना चाहिए, बल्कि हमें इस भक्ति की साधना को दूसरों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी करनी चाहिए क्योंकि वह भी भगवान के आदेशों में से एक है। भगवान निश्चित रूप से कहते हैं कि कोई भी उनसे अधिक प्रिय नहीं है जो हमेशा दुनिया भर में भगवान के नाम और प्रसिद्धि के प्रचार कार्य में लगे रहते हैं। भौतिक दुनिया की वैज्ञानिक खोजों को भी उसी तरह उनके आदेश को पूरा करने में लगाया जा सकता है। वह चाहते हैं कि भगवद-गीता का संदेश उनके भक्तों के बीच प्रचारित किया जाए। यह उन लोगों के बीच नहीं किया जा सकता जिनके पास तपस्या, दान, शिक्षा आदि का कोई श्रेय नहीं है। इसलिए, अनिच्छुक पुरुषों को उनका भक्त बनाने के लिए प्रयास जारी रहा। भगवान चैतन्य ने इस संबंध में एक बहुत ही सरल तरीका सिखाया है। उन्होंने गायन, नृत्य और जलपान के माध्यम से पारलौकिक संदेश का प्रचार करने का पाठ पढ़ाया है। ऐसे में हमारी आय का पचास प्रतिशत इस उद्देश्य के लिए खर्च किया जा सकता है। कलह और विवाद के इस पतित युग में, यदि केवल समाज के अग्रणी और धनी व्यक्ति अपनी आय का पचास प्रतिशत भगवान की सेवा में खर्च करने के लिए सहमत हों, जैसा कि भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने सिखाया है, तो निश्चित रूप से इस पांडेमोनियम के नर्क को बदलने की निश्चितता है। भगवान का पारलौकिक निवास। अच्छे गायन, नृत्य और जलपान का प्रबंध हो तो कोई भी समारोह में शामिल होने से मना नहीं करेगा। इस तरह के समारोह में हर कोई शामिल होगा और भगवान की दिव्य उपस्थिति को व्यक्तिगत रूप से महसूस करना निश्चित है। अकेले यह ही उपस्थित लोगों को भगवान के साथ जुड़ने और इस तरह आध्यात्मिक अनुभूति में खुद को शुद्ध करने में मदद करेगा। ऐसी आध्यात्मिक गतिविधियों को सफलतापूर्वक निष्पादित करने की एकमात्र शर्त यह है कि उनका संचालन एक शुद्ध भक्त के मार्गदर्शन में होना चाहिए जो सभी सांसारिक इच्छाओं, फलदायक गतिविधियों और भगवान के स्वरूप के बारे में शुष्क अटकलों से पूरी तरह मुक्त है। किसी को भी प्रभु की प्रकृति का पता नहीं लगाना है। यह स्वयं भगवान द्वारा विशेष रूप से भगवद गीता में और सामान्य रूप से अन्य सभी वैदिक साहित्यों में पहले ही कहा जा चुका है। हमें बस उन्हें समग्र रूप से स्वीकार करना है और प्रभु के आदेशों का पालन करना है। यह हमें पूर्णता के मार्ग पर ले जाएगा। मनुष्य अपनी स्थिति में बना रह सकता है। किसी को भी अपनी स्थिति बदलने की जरूरत नहीं है, खासकर यह विभिन्न कठिनाइयों के युग में। एकमात्र शर्त यह है कि भगवान के साथ एकरूप होने के उद्देश्य से शुष्क अटकल की आदत छोड़ देनी चाहिए। और इस तरह की ऊँची उड़ी हुई वन्दनाओं को छोड़ने के बाद, व्यक्ति ऊपर बताई गई योग्यता वाले एक वास्तविक भक्त के मुंह से भगवद-गीता या भागवतम में भगवान के आदेशों को बहुत नम्रतापूर्वक प्राप्त कर सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सब कुछ सफल होगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)