प्रस्थान करते समय वे दयालु भक्तिवेदांतों ने, जो गरीब और दीन जनों से अत्यंत प्यार करते हैं, मुझे उस सबसे गुप्त विषय का उपदेश दिया, जो स्वयं भगवान द्वारा बताया गया था।
While leaving, those Bhaktivedanta, very kind to the poor people, taught me about the most profound subject, which is taught by the Lord Himself.
तात्पर्य
एक शुद्ध वेदान्ती, या भक्ति-वेदान्त, अनुयायियों को भगवान के निर्देशों के अनुसार ही निर्देश देता है। भगवान, भगवद-गीता और दूसरे सभी शास्त्रों में, मनुष्यों को केवल भगवान का अनुसरण करने के लिए निश्चित रूप से निर्देश दिया है। भगवान सभी चीजों का निर्माता, पालनहार और विनाशक है। पूरी प्रकट सृष्टि उनकी इच्छा से मौजूद है, और उनकी इच्छा से जब सारा दिखावा समाप्त हो जाएगा, तो वह अपने सभी सामान के साथ अपने शाश्वत निवास में रहेंगे। सृष्टि से पहले वह शाश्वत निवास में थे, और विनाश के बाद भी वहीं बने रहेंगे। इसलिए, वह सृजित प्राणियों में से एक नहीं है। वह पारलौकिक है। भगवद-गीता में भगवान कहते हैं कि अर्जुन को निर्देश देने से बहुत पहले, सूर्य-देव को निर्देश दिया गया था, और समय के साथ, वही निर्देश, गलत तरीके से संभाले जाने और तोड़े जाने के कारण, अर्जुन को फिर से निर्देश दिया गया क्योंकि वह उनका पूर्ण भक्त और मित्र थे। इसलिए, भगवान के निर्देश को केवल भक्त ही समझ सकते हैं और कोई और नहीं। व्यक्तित्ववादी, जिसे भगवान के पारलौकिक रूप का कोई पता नहीं है, वह भगवान के इस सबसे गुप्त संदेश को नहीं समझ सकता है। अभिव्यक्ति "सबसे गुप्त" यहाँ महत्वपूर्ण है क्योंकि भक्ति सेवा का ज्ञान निःस्वार्थ ब्रह्म के ज्ञान से कहीं ऊपर है। ज्ञान का अर्थ है साधारण ज्ञान या ज्ञान की कोई भी शाखा। यह ज्ञान निःस्वार्थ ब्रह्म के ज्ञान तक विकसित होता है। इससे ऊपर, जब इसे आंशिक रूप से भक्ति के साथ मिलाया जाता है, तो ऐसा ज्ञान परमात्मा, या सर्वव्यापी ईश्वर के ज्ञान के रूप में विकसित होता है। यह अधिक गोपनीय है। परantu जब ऐसा ज्ञान शुद्ध भक्ति सेवा में बदल जाता है और दिव्य ज्ञान का गुप्त भाग प्राप्त होता है, तो इसे सबसे गुप्त ज्ञान कहा जाता है। यह सबसे गुप्त ज्ञान भगवान द्वारा ब्रह्मा, अर्जुन, उद्धव आदि को दिया गया था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥