श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  1.5.29 
तस्यैवं मेऽनुरक्तस्य प्रश्रितस्य हतैनस: ।
श्रद्दधानस्य बालस्य दान्तस्यानुचरस्य च ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
मैं उन मुनिवरों से बहुत जुड़ा हुआ था। मेरा व्यवहार सौम्य था, और उनकी सेवा में मेरे सारे पाप नष्ट हो चुके थे। मेरे हृदय में उनके लिए प्रबल श्रद्धा थी। मैंने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया था और तन-मन से उनका दृढ़तापूर्वक अनुसरण कर रहा था।
 
I was very attached to those sages. My conduct was humble and all my sins were destroyed by serving them. I had great respect for them in my heart. I had controlled my senses and I followed them firmly with body and mind.
तात्पर्य
ये वे आवश्यक योग्यताएं हैं एक संभावित अभ्यर्थी की जो उम्मीद करता है कि वह एक शुद्ध और अपरिष्कृत भक्त के पद तक उन्नत हो जाएगा। ऐसे उम्मीदवार को हमेशा शुद्ध भक्तों के संघ की तलाश करनी चाहिए। किसी को भी एक छद्म भक्त द्वारा गुमराह नहीं किया जाना चाहिए। उसे खुद सादा और सज्जन होना चाहिए ताकि वह ऐसे शुद्ध भक्त के निर्देशों को प्राप्त कर सके। एक शुद्ध भक्त ईश्वर के व्यक्तित्व के प्रति पूरी तरह से समर्पित आत्मा है। वह ईश्वर के व्यक्तित्व को सर्वोच्च स्वामी और अन्य सभी को उनके सेवकों के रूप में जानता है। और केवल शुद्ध भक्तों के संघ द्वारा ही, वह सांसारिक संगति से संचित सभी पापों से मुक्त हो सकता है। एक नवोदित भक्त को शुद्ध भक्त की ईमानदारी से सेवा करनी चाहिए, और उसे बहुत आज्ञाकारी होना चाहिए और निर्देशों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। ये एक भक्त का संकेत है जो जीवन की वर्तमान अवधि में भी सफलता प्राप्त करने के लिए दृढ़ है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)