श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  1.5.26 
तत्रान्वहं कृष्णकथा: प्रगायता-
मनुग्रहेणाश‍ृणवं मनोहरा: ।
ता: श्रद्धया मेऽनुपदं विश‍ृण्वत:
प्रियश्रवस्यङ्ग ममाभवद्रुचि: ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
हे व्यासदेव, उस संगति में और उन महान वेदांती लोगों की अनुकंपा से, मैं उनके मुख से भगवान् श्री कृष्ण की मनोहर लीलाओं का वर्णन सुन सका और इस प्रकार गौर से सुनते रहने से प्रतिपल प्रभु के विषय में और अधिक सुनने के लिए मेरी उत्सुकता बढ़ती ही गई।
 
O Vyasa, in that association and by the grace of those great Vedantins, I was able to hear their description of the beautiful pastimes of Lord Krishna, and by thus listening attentively my interest in hearing more and more about the Lord increased every moment.
तात्पर्य
भगवान श्री कृष्ण, ईश्वर की परम हस्ती, न केवल अपने व्यक्तिगत गुणों में आकर्षक हैं, बल्कि अपनी पारलौकिक गतिविधियों में भी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि परम अपने नाम, यश, रूप, शगल, दल, सामग्री, आदि से परम है। प्रभु अपनी अकारण दया से इस भौतिक जगत में अवतरित होते हैं और एक मनुष्य के रूप में अपने विविध पारलौकिक शगलों का प्रदर्शन करते हैं ताकि उनके प्रति आकर्षित मनुष्य ईश्वर के पास वापस जाने में सक्षम हो सकें। मनुष्य स्वाभाविक रूप से सांसारिक गतिविधियों में भाग लेने वाले विभिन्न व्यक्तियों के इतिहासों और कथाओं को सुनने के शौकीन हैं, यह समझे बिना कि इस तरह के संगठन से एक व्यक्ति केवल मूल्यवान समय बर्बाद करता है और सांसारिक प्रकृति के तीन गुणों का आदी भी हो जाता है। समय बर्बाद करने के बजाय, कोई व्यक्ति प्रभु के पारलौकिक शगलों पर अपना ध्यान केंद्रित करके आध्यात्मिक सफलता प्राप्त कर सकता है। प्रभु के शगलों के वर्णन को सुनकर, कोई व्यक्ति सीधे ईश्वर के व्यक्तित्व से संपर्क करता है, और जैसा पहले समझाया गया है, ईश्वर के व्यक्तित्व के बारे में भीतर से सुनकर, सांसारिक प्राणी के सभी संचित पापों को साफ हो जाते हैं। इस प्रकार पापों से मुक्त होने के कारण, श्रोता धीरे-धीरे सांसारिक संगति से मुक्त हो जाता है और प्रभु की विशेषताओं की ओर आकर्षित हो जाता है। नारद मुनि ने अभी अपने व्यक्तिगत अनुभव द्वारा इसे समझाया है। इस पूरी बात का यही सार है कि केवल प्रभु के शगलों के बारे में सुनकर कोई व्यक्ति प्रभु के सहयोगियों में से एक बन सकता है। नारद मुनि को शाश्वत जीवन, असीमित ज्ञान और अथहा आनंद प्राप्त है और वह बिना किसी प्रतिबंध के भौतिक और आध्यात्मिक दुनिया में घूम सकते हैं। व्यक्ति जीवन की सर्वोच्च पूर्णता को केवल प्रभु के पारलौकिक शगलों की सही स्रोतों से आज्ञाकारी सुनवाई से प्राप्त कर सकता है, जैसा कि श्री नारद ने अपने पिछले जीवन में शुद्ध भक्तों (भक्ति-वेदांत) से सुना था। भक्तों के साथ मिलकर सुनने की इस प्रक्रिया की विशेष रूप से कलह (कली) के इस युग में सिफारिश की जाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)